भारत में सांप्रदायिक प्रतिक्रिया के खिलाफ लड़ाई समाजवाद की लड़ाई है

२१ दिसम्बर २०१९

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने 12 दिसंबर को संसद में ज़बस्दस्ती  मुस्लिम विरोधी संवैधानिक संशोधन अधिनियम (CAA) को निकसित किआ जिस कारण  विरोध प्रदर्शनों की बढ़ती लहर ने भारत को आक्षेपित कर दिआ है।

CAA  स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार नागरिकता निर्धारित करने में धर्म को एक मापदंड बनाता है। भारत को एक हिंदू राष्ट्रया राज्य में बदलने के लिए - यह भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक, छायावादी, फासीवादी RSS  के उकसावे वाले केंद्रीय उद्देश्य को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है - जिसमें मुस्लमान अल्पसंख्यक को "सहन" किया जायेगा, जब  तक यह हिंदू वर्चस्व को स्वीकार करते  है।

भारत के नालबारी में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में प्रदर्शन के दौरान भारतीय नारे लगते हुए, शुक्रवार, 20 दिसंबर, 2019 (एपी फोटो / अनुपम नाथ)

मुस्लमान  छात्र और युवा CAA  के विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं। लेकिन विरोधों ने धार्मिक-संप्रदायवादी, जातीय और जातिगत विभाजनो  को चीरते हुए  भारत के सभी हिस्सों को घेर लिया है ।

नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन भारत और श्रीलंका में हमलों की एक लहर का अनुसरण करते हैं, जो अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका से फैले वर्ग संघर्ष के एक वैश्विक उतार-चढ़ाव का हिस्सा हैं।

व्याकुल भाजपा सरकार ने बड़े पैमाने पर CAA  के विरोध का जवाब प्रदर्शनकारियों को दमन करके किया  है। उत्तर भारत में सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में कम से कम छह लोग शुक्रवार को मारे गए थे। देश के बड़े क्षेत्रों में, जिनमें उत्तर प्रदेश (जनसंख्या 230 मिलियन) और कर्नाटक (65 मिलियन) शामिल हैं और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कुछ हिस्सों में भी, सरकार ने आपराधिक संहिता की धारा 144 लागू की है, जिससे चार से अधिक लोगों की सभी सभाएँ अवैध मानी जाती है । करोड़ों लोग इंटरनेट से वंचित हुए  हैं और कुछ मामलों में, सेल फोन सेवा भी रद्द कर दिआ गया है ।

CAA  के तहत, मुसलमानो को छोड़कर - 2015 से पहले अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत पलायन करने वाले सभी लोगों को प्रभावी रूप से नागरिकता प्रदान किआ जायेगा । यह एक और भी भयावह सांप्रदायिक योजना के लिए तैयारी है जिसके तहत  भारत के सभी 1.3 बिलियन लोगों को अधिकारियों की संतुष्टि के लिए यह साबित करने पर  मजबूर किआ जायेगा कि वे भारतीय नागरिकता के हकदार हैं। CAA  के पारित होने से स्पष्ट होता है कि भाजपा के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का एकमात्र उद्देश्य मुसलमानों को डराना, परेशान करना और पीड़ित करना होगा - क्योंकि वे और वे अकेले ही राज्यविहीन  घोषित होने के खतरे में होंगे, ”जिससे वे  अपने सभी नागरिकता के अधिकार हार जायेंगे और नज़रबंदी एवं  निष्कासन के अधीन होंगे ।

CAA  और NRC  भाजपा सरकार द्वारा मुहैया कराए गए सांप्रदायिक उकसावों की एक लंबी श्रृंखला में केवल नवीनतम हैं। 5 अगस्त को, इसने अवैध रूप से भारत के अकेले मुस्लिम बहुल राज्य, जम्मू और कश्मीर की अद्वितीय अर्ध-स्वायत्त स्थिति को रद्द कर  इस क्षेत्र को स्थायी केंद्र सरकार के नियंत्रण में रख दिया। इस संवैधानिक तख्तापलट को हजारों अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, हजारों के आरोप के बिना नजरबंदी और सेलफोन और इंटरनेट एक्सेस के एक महीने के लंबे निलंबन से लागू किया गया है।

मोदी सरकार और RSS  की मांगों के आगे हुकते  हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने फैसला सुनाया कि अयोध्या में एक हिंदू मंदिर का निर्माण हो, जहाँ 1992 तक बाबरी मस्जिद (मस्जिद) हुआ करता था और जिसे  हिंदू कट्टरपंथियों ने भाजपा के नेतृत्व में ध्वस्त  कर दिया था ।

भारत में श्रमिकों, छात्रों और पेशेवरों के बीच - मुस्लमान और हिंदू सम्मिलित  - इस मणुद्दे पर काफी गुस्सा और घृणा है की  "धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक" भारत को आज क्या हो गया है और इन्होने विरोध करने का दृढ़ संकल्प लिआ है।

लेकिन प्रबल होने के लिए उन्हें एक अंतर्राष्ट्रीयवादी और समाजवादी रणनीति से लैस होना चाहिए। पूंजीवादी अभिजात वर्ग और उसके सभी राजनीतिक प्रतिनिधियों के खिलाफ और मजदूरों की शक्ति के संघर्ष में पूंजीपति वर्ग की अति-राष्ट्रवाद, फासीवाद और अधिनायकवाद की बारी को केवल श्रमिक वर्ग के स्वतंत्र राजनीतिक जमावड़े के माध्यम से सफलतापूर्वक विरोध किआ  जा सकता है।

एक वैश्विक घटना

मोदी सरकार और उसके सांप्रदायिक आक्रमण एक सार्वभौमिक घटना की भारतीय अभिव्यक्ति हैं। कभी बढ़ती सामाजिक असमानता, बढ़ती वैश्विक वर्ग संघर्ष, और बाजारों, संसाधनों और भू-भौतिक लाभ के लिए एक उन्मादी अंतर-पूंजीवादी संघर्ष के तहत, पूंजीपति हर जगह शासन के सत्तावादी तरीकों की ओर मुड़ रहे हैं और अल्ट्रा-राइट और फासीवादी ताकतों की पोषण  कर रहे हैं।

यह साम्राज्यवादी "लोकतंत्रों" का सच है जो भारत, तुर्की और ब्राजील जैसे बेलगाम पूंजीवादी विकास वाले देशों से कम नहीं है।

अमेरिका में, ट्रम्प लोकतांत्रिक अधिकारों पर व्यापक हमले कर रहे हैं, और सैन्य और पुलिस के प्रति उनकी अपील और समाजवाद की भद्दी टिप्पणियों के साथ, एक फासीवादी आंदोलन विकसित करने की कोशिश  कर रहे हैं।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन विची नाज़ी  सहयोगी मार्शल पेअन का पुनर्वास करने की व्यवस्था कर चुके है  और बड़े पैमाने पर सामाजिक कटौती लगाने और आक्रामक फ्रांसीसी सैन्यवाद को पुनर्जीवित करने के लिए बार-बार सामाजिक विरोध के हिंसक दमन का आदेश देते आए है । जर्मनी में, खुफिया एजेंसियों और सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग ने नव-नाजी AfD को बढ़ावा दिया है, जिससे यह रेचसटैग  में आधिकारिक विरोधी  पक्ष बन सके ।

2014 में भारत के  बड़े कारोबारियों ने मोदी को सत्ता में ले आए  ताकी  विश्व मंच पर वे अपने शिकारी हितों पर अधिक आक्रामक रूप से जोर दे सके  और ज़बरदस्ती सामाजिक रूप से घिनौने निवेश - समर्थक नीतियों को लागू कर सके ।  

भाजपा के दूसरे कार्यकाल के पहले छह महीनों के दौरान, इसने एक साथ हिंदू अधिकार के वर्चस्ववादी एजेंडे को लागू करने और नव-उदारवादी सुधार को लागू करने के लिए अपने अभियान को तेज कर दिए  है, जिसमें निजीकरण की ताजा लहर और बड़े व्यापार के लिए और बड़े कर कटौती शामिल हैं।

मोदी और उनके प्रमुख अनुयायी , होम मिनिस्टर अमित शाह, इस बात से पूरी तरह वाकिफ़ हैं कि डींगे मारने लायक "उभरता हुआ" पूंजीवादी भारत सामाजिक तौर पे  बारूद से भरा ड्रम है जिसमें सिर्फ  चिंगारी लगने की देरी है।   वे अपने हिंदू फासीवादी आधार को बढ़ाने के उद्देश्य से मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिकता को हवा दे रहे हैं, जो एक तेजी से बेचैन और लड़ाकू  श्रमिक वर्ग के खिलाफ दहशत  की सेना के रूप में दिखाई दे रही है।  इससे बढ़ते  सामाजिक तनाव को सामाजिक असमानता और तेजी से बिगड़ती अर्थव्यवस्था को प्रसारित करने की ओर निर्देशित किआ जा रहा है जिसके  परिणामस्वरूप  प्रतिकूल विदेशी निवेश नीतियों को लागू किआ जा सके ।

दुनिया भर में उभरते हुए प्रवृत्ति के अनुकूल, भारत में भी, पूँजीवादी उत्पादन और अपने अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रति आत्म-सचेत होने के कारण विश्व स्तर पर एकजुट श्रमिक वर्ग ही है - जो पूँजीवादी प्रतिक्रिया, अधिनायकवाद और युद्ध के खिलाफ एक आक्रामक हमले के लिए सामाजिक आधार का गठन कर रहे  है। लेकिन मजदूर वर्ग की अपार सामाजिक शक्ति को तभी  जुटाया जा सकता है जब  यह स्वयं को अलग से पूंजीपतियों के सभी राजनीतिक प्रतिनिधियों के विरोध में संगठित कर सके ।

कांग्रेस पार्टी, हाल ही तक, जो पूंजीपति वर्ग की सरकार की  प्रमुख दल थी, क्षेत्रीय-अन्धराष्ट्रीवादी  और जाति-विरोधी दलों की  एक गुट थी, अब इस बढ़ते विरोध  को  राजनीतिक रूप से शोषण करने और मोदी सरकार की ओर निर्देशित और  सीमित रखने की कोशिश कर रहे है ।

प्रतरूप  स्तालिनवादी संसदीय दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), या CPM  और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI ) द्विशेष रूप से निंदनीय और खतरनाक भूमिका निभा रहे  है।

आज, जैसा कि 1992 में बाबरी मस्जिद पर धावा बोलने के बाद; 2002 में मोदी द्वारा गुजरात के मुस्लमान विरोधी  पोग्रोम की अध्यक्षता करने के बाद; और 2014 में जब मोदी पहली बार बहुमत वाली भाजपा सरकार के मुखिया के रूप में सत्ता में आए, स्तालिनवादियों ने  हिंदू फासीवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई । लेकिन वे ऐसा केवल श्रमिक  वर्ग  को भारतीय पूंजीपति दलों और संस्थानों के साथ बांधने के उद्देश्य से कर रहे है।  

दक्षिणपंथी हिंदू अधिकार से लड़ने के नाम पर, स्तालिनवादियों ने व्यवस्थित रूप से वर्ग संघर्ष को दबाकर भारतीय पूंजीपति वर्ग के नव-उदारवादी एजेंडे को लागू करने में मदद कर  रहे है।  1989 और 2008 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व में दक्षिणपंथी और अमरीका-मुखी  सरकारों को सत्ता पर लाने और उनके  उत्तराधिकार को बनाये रखने में उनकी भूमिका से स्पष्ट है।  इसके अलावा, उन राज्यों में जहां उन्होंने राज किआ है (पश्चिम बंगाल, केरल, और त्रिपुरा) स्तालिनवादियों ने स्वयं "प्रो-इन्वेस्टर" नीतियों को लागू किया है।  

जिस तरह से बाकी के उन्नत पूंजीवादी देशों में युद्ध - मुखी, तपस्या-मुखी उपायों से "वाम" दलों ने आती - दक्षिणवाद को बढ़ावा दिया - उसी तरह  स्तालिनवादियों ने मज़दूर वर्ग को दबाकर, सांप्रदायिक प्रतिक्रिया की वृद्धि के लिए राजनीतिक मिट्टी को निषेचित किया है।

इसी लिए , तीन दशकों के बाद, जिसमें स्टालिनवादियों ने दावा किया कि हिंदू अधिकार को हराना उनका मुख्य उद्देश्य और मार्गदर्शक सिद्धांत है, मोदी और उनकी बीजेपी ने अभूतपूर्व शक्ति हासिल की ।

आज, CPM और CPI  एक बार फिर “लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता” का बचाव करने के लिए बड़े व्यापारी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर  एकता और धर्मनिरपेक्षता का आह्वान कर रहे हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता कि कांग्रेस का  दक्षिणपंथी हिंदू अधिकार को  समर्थन करने और उकसाने  का इतिहास रह चूका  है। पिछले महीने, CPM  द्वारा समर्थित एक कार्रवाई में, इसने महाराष्ट्र में, जो  भारत की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है,   एक गठबंधन सरकार का  सत्ता में आना  सुनिश्चित किया, वो भी शिवसेना के नेतृत्व में, जो एक हिंदू वर्चस्ववादी और मराठा -अराजकतावादी पार्टी है , जो कुछ हफ्ते पहले तक भाजपा का सबसे करीबी सहयोगी हुआ करता था।

स्थायी क्रांति और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई

स्टालिनवादियों ने मोदी शासन के लोकतंत्र - विरोधी  और गैरकानूनी कार्यों का विरोध करने के लिए पूंजीवादी राज्य के सर्वोच्च न्यायालय और अन्य निडर दक्षिणपंथी संस्थानों से उम्मीद रखने के लिए श्रमिक वर्ग को उत्साहित किआ है। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट ने दशकों तक एक के बाद एक सांप्रदायिक और सत्तावादी उल्लंघन  को बढ़ावा  दिया है।

स्तालिनवादियों ने मज़दूर वर्ग को अपने कार्यक्रम की औचित्य यह साबित करके किया कि भारतीय गणराज्य और उसके संस्थान उस साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष का उत्पाद हैं जिसने 20 वीं शताब्दी के पहले भाग के दौरान दक्षिण एशिया को बुरी तरह से हिला दिए था।   

यह एक झूठ है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके स्थानीय बुर्जुआ ग्राहकों के बीच एक गंभीर समझौते के माध्यम से भारत के राज्य की स्थापना दक्षिण एशिया मजदूरों और क्रांतिकारियों के क्रांतिकारी प्रयासों के दमन पर की गई थी। एक संयुक्त लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए अपने कार्यक्रम को धोखा देते हुए, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दक्षिण एशिया के ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिपतियों और मुस्लिम लीग के साथ दक्षिण एशिया के सांप्रदायिक विभाजन को एक स्पष्ट रूप से मुस्लिम पाकिस्तान और मुख्य रूप से हिंदू भारत में लागू करने के लिए हाथ मिलाया।

कांग्रेस,  गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, भारतीय पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए, श्रमिक वर्ग की बढ़ती उथल-पुथल की स्थितियों के तहत ब्रिटिश औपनिवेशिक पूंजीवादी राज्य व्यवस्था  पर अपना हाथ पाने के लिए उत्सुक थे। वे अंग्रेजों और उनके हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकतावादि विभाजन और शासन की रणनीति का मुकाबला करने के एकमात्र साधन को प्रयोग करने में अक्षम्य और प्रतिरोधी थे - जो था दक्षिण एशिया के हिंदू, मुस्लिम और सिख कार्यकर्ताओं को लामबंध करना और एक जुट होकर साम्राज्यवाद, जमींदारवाद और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए अपील करना।  

विभाजन का तत्काल प्रभाव सामूहिक सांप्रदायिक हिंसा थी जिसमें  एक मिलियन से अधिक लोग मारे गए और 20 मिलियन के करीब बेघर हुए । लेकिन इसके अतिरिक्त, इसने एक प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक राज्य प्रणाली को जन्म दिआ  जिसने साम्राज्यवाद को इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम रखने में सहायता की।  इसने प्रतिक्रियावादी अंतर-राज्य प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया, जिससे कई युद्ध हुए हैं और आज इस क्षेत्र को भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु हथियारों के साथ संघर्ष होने का  खतरा है, और इसका उपयोग दक्षिण एशिया के प्रतिक्रियावादी सत्तारूढ़ कुलीनों द्वारा सांप्रदायिकता को उकसाने और विभाजित करने के लिए किया जा रहा है।

भारतीय स्वतंत्रता के 72 साल बाद , भारत का असल में, नाममात्र के धर्मनिरपेक्ष और कथित रूप से गैर-सांप्रदायिक राज्य होने की असलियत उभर रही है । यह रूस में 1917 अक्टूबर की क्रांति के सबक लेने और भारत के श्रमिकों की निरंतरता का एक और प्रदर्शन है और स्थायी क्रांति की रणनीति को उनके संघर्ष की धुरी बनाने की ज़रुरत को दर्शाता है । बे-लगाम पूंजीवादी विकास वाले देशों में, लोकतांत्रिक क्रांति का एक भी बुनियादी काम ग्रामीण समाज के साथ गठबंधन में श्रमिक वर्ग के नेतृत्व वाली समाजवादी क्रांति के बिना सुरक्षित नहीं किया जा सकता है।

सांप्रदायिक प्रतिक्रिया के खिलाफ संघर्ष एक समाजवादी अंतर्राष्ट्रीयवादी दृष्टिकोण से सजीव होना चाहिए। भारत के श्रमिकों और सभी संप्रदायों और जातिगत वर्गों के लोगों को एकजुट करने की लड़ाई दुनिया भर के श्रमिकों के साथ उनके संघर्षों को एकजुट करने की लड़ाई के साथ हाथ मिलाने की ज़रुरत है ।

लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा सामाजिक असमानता, अनिश्चित रोजगार, वाशिंगटन के साथ भारतीय पूंजीपति वर्ग के सैन्य-रणनीतिक गठबंधन और इसके बड़े पैमाने पर सैन्य निर्माण के खिलाफ मजदूर वर्ग को जुटाने की लड़ाई से अविभाज्य है ।

इसके लिए वर्ग संघर्ष को तीव्र करने की आवश्यकता है। मजदूर वर्ग को पूंजीपति और उसके सभी राजनैतिक प्रतिनिधियों के विरोध में अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए, और श्रमिक एवं  किसानों की सरकार के संघर्ष में ग्रामीण गरीब और उत्पीड़ित मीलों को एक जुट करना चाहिए, क्योंकि यह एक अंतरराष्ट्रीय कार्य प्रणाली  के विकास का हिस्सा है- विश्व पूंजीवाद और साम्राज्यवादी युद्ध के खिलाफ वर्ग आक्रामक।

इस लड़ाई में शामिल होने के लिए हम सभी भारतीय कामगारों, छात्रों और अन्य लोगों से आग्रह करते हैं कि वे  विश्वसमाजवादीवेबसाइट और चौथे  इंटरनेशनल की अंतर्राष्ट्रीय समिति से संपर्क करें ।  

कीथ जोन्स