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ग्रामीण रोज़गार गारंटी प्रोग्राम को रद्दी की टोकरी में फेंक कर भारत की मोदी सरकार ने ग़रीबों के ख़िलाफ़ प्रहार तेज़ किया

यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India’s Modi government intensifies war on the poor by gutting rural job guarantee programme का है जो 26 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुआ था।

मनरेगा रोज़गार योजना में कार्यरत मज़दूर (फ़ोटो: अखिल भारतीय मनरेगा ठेका मज़दूर संघ) [Photo: All India MGNREGA Contractual Employees Federation]

मज़दूर वर्ग और ग्रामीण ग़रीबों पर अपने हमले तेज़ करते हुए भारत की भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने आनन फानन में विकसित भारत-गारंटी फ़ॉर रोज़गार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025 या जिसे शार्ट में वीबी-जी राम जी बिल कहा जा रहा है, को 18-19 दिसंबर को संसद में सभी संसदीय परम्पराओं को ताक पर रख कर पास करा लिया।

इस क़ानून ने दो दशक पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट (मनरेगा) को हटा दिया है, जोकि एक सार्वजनिक निर्माण स्कीम थी और जिसे ग्रामीण बेरोज़गारी से राहत देने के लिए लाया गया था, हालांकि यह गहराते सामाजिक संकट में सिर्फ फ़र्स्ट एड की तरह काम करता रहा है।

मनरेगा को फ़रवरी 2006 में कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लॉन्च किया था, जिसमें अकुशल और हाथ से काम के लिए साल में एक परिवार के एक सदस्य को 100 दिनों के रोज़गार की गारंटी दी गई थी, जैसे कि सड़क निर्माण और सिंचाई के साधन बनाने जैसे काम।

लेकिन यह गारंटी कभी पूरी तरह पूरी नहीं की गई। लेकिन मनरेगा ने एक काम तो किया ही, उसने ग़रीबी की मार से जूझ रहे करोड़ों ग़रीब भारतीयों की आमदनी बढ़ाने में मदद की, इसने भूख, कुपोषण, दुर्बलता और अन्य सामाजिक बुराइयों को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं किया लेकिन कम ज़रूर किया।

अब मोदी सरकार ग्रामीण रोज़गार 'गारंटी' को रद्दी की टोकरी में फेंक रही है, जिससे सत्ताधारी वर्ग के सबसे लालची उस तबके की मांग पूरी होती है, जो लंबे समय से इसकी लागत (हालांकि भारत जितना सेना पर ख़र्च करता है उसका शतांश भी नहीं है) का रोना रोता रहा है और शिकायत करता रहा है कि इसने ग्रामीण 'मज़दूरी' को बढ़ा दिया है जिससे बाज़ार में मज़दूरी का संतुलन गड़बड़ा गया है।

मोदी सरकार के वीबी-जी राम जी क़ानून के तहत, अधिकार आधारित और मांग-प्रेरित इस रोज़गार 'गारंटी' को एक कड़े नियंत्रण वाली नौकरशाही योजना के रूप में फिर से परिभाषित किया गया है जो जनता की पहुंच को सीमित करती है, फ़ंडिंग को बाधित करती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया को संघ या केंद्र सरकार के स्तर पर केंद्रीकृत करती है।

जब सैद्धांतिक रूप से इसे स्वीकार किया गया तो अनुमान लगाया गया कि इसे पूरी तरह लागू करने का सालाना खर्च 400 अरब रुपये आएगा, जिसमें मौजूदा ग़रीबी से उत्थान वाली योजनाओं की भी फ़ंडिंग लगाई जाएगी। लेकिन दो दशकों में यह खर्च वास्तविक अर्थों में मुश्किल से ही बढ़ा। उदाहरण के लिए महंगाई, आबादी में बढ़ोत्तरी और बढ़ते ग्रामीण संकट के बावजूद 2024-2025 में मनरेगा का बजटीय आवंटन 860 अरब रुपये के आस पास बना रहा और मौजूदा वित्त वर्ष के लिए भी यही स्तर बना रहा।

द हिंदू के मुताबिक़, ताज़ा अनुमान दिखाता है कि 12.6 करोड़ से अधिक सक्रिय वर्कर मनरेगा पर निर्भर हैं। इसका मतलब है कि यह हर साल करोड़ों ग़रीब ग्रामीणों को मदद मुहैया कराता है।

मनरेगा कार्यबल में महिलाओं की संख्या आधे से अधिक है, पिछले पांच वर्षों में उनकी भागीदारी औसतन लगभग 58 प्रतिशत रही है, जो ग्रामीण भारत में महिलाओं के रोज़गार को बनाए रखने में योजना की केंद्रीय भूमिका को सामने लाती है।

कार्यक्रम की शुरुआत से ही यह चेतावनी दी जा रही थी कि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के चलते स्थानीय पार्टी के नेता फ़ंड का गबन कर लेंगे, जैसा कि पहले भी इसी तरह की सरकारी योजनाओं में देखा गया था। मोदी सरकार ने इसी बात का फ़ायदा उठाकर कार्यक्रम को बंद करने का फैसला किया है। लोकसभा में हुई बहस का जवाब देते हुए कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दावा किया कि मनरेगा में कई तरह की समस्याएं हैं, भ्रष्टाचार चरम पर है और राज्य सरकारों पर फ़ंड के दुरुपयोग का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि ख़र्च के नियमों का उल्लंघन हुआ है और सामग्री की लागत निर्धारित स्तर से काफ़ी कम है।

हालांकि भ्रष्टाचार के आरोपों में कुछ हद तक सच्चाई है, लेकिन बीजेपी सरकार द्वारा शुरू की गई किसी भी बड़ी योजना के ख़िलाफ़ इसी तरह के आरोप लगाए जा सकते हैं, जिसने भारत की बुनियादी सामाजिक कल्याण योजनाओं का निजीकरण करने और उन्हें बाज़ार के हवाले करने की कोशिश की है।

कांग्रेस पार्टी ने 21 दिसंबर को देशभर के ज़िला मुख्यालयों में मोदी सरकार द्वारा मनरेगा योजना में किए गए बदलावों के ख़िलाफ़ प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया। 20 दिसंबर को एक वीडियो बयान में, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस क़ानून को लाखों किसानों, मज़दूरों और भूमिहीन ग़रीबों के हितों पर 'हमला' बताया और इस 'काले क़ानून' के ख़िलाफ़ लड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने की आलोचना की और कहा कि मोदी सरकार द्वारा सालों तक इसे पर्याप्त आवंटन देने से वंचित रखने के बाद इसे 'मनमाने ढंग से' बदल दिया गया है।

कांग्रेस पार्टी का विरोध पूरी तरह से पाखंडी और स्वार्थपरक है। दो दशक पहले इन योजनाओं को शुरू करने के पीछे उसका मुख्य उद्देश्य अपनी ही बाज़ार-समर्थक आर्थिक नीतियों से उत्पन्न सामाजिक अशांति को कम करना था। इसी प्रकार, आज उसका मुख्य डर यही है कि मनरेगा को ख़त्म करने से बड़े पैमाने पर सामाजिक विरोध भड़क उठेगा।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक (एमपीआई) 2025 के अनुसार, 2023 में भारत की लगभग 16.4 प्रतिशत आबादी (लगभग 23.5 करोड़ लोग) चौतरफ़ा ग़रीबी से ग्रस्त थी। इसका मतलब है कि वे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी जीवन स्तर जैसे आवश्यक क्षेत्रों में कई तरह के संकटों का सामना कर रहे हैं—यह आंकड़ा अत्यधिक आर्थिक ग़रीबी के लिए आमतौर पर बताए गए 2-5 प्रतिशत के आंकड़े से कहीं अधिक है। इसके अलावा, आबादी का अन्य 18 प्रतिशत यानी 26.9 करोड़ लोग, चौतरफ़ा ग़रीबी के प्रति संवेदनशीलता के रूप में वर्गीकृत हैं, जो ग़रीबी रेखा से थोड़ा ऊपर जीवन यापन कर रहे हैं और आर्थिक झटकों या सामाजिक सहायता में कटौती के कारण उन पर लगातार ग़रीबी में धकेले जाने की तलवार लटक रही है। ग्रामीण रोज़गार 'गारंटी' को ख़त्म करने से, भले ही इससे मिलने वाली सहायता कितनी भी मामूली हो, करोड़ों ग्रामीण ग़रीबों के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा छिन जाएगा, जिससे भूख और सामाजिक संकट में तेज़ी से वृद्धि होगी।

साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही मोदी और उनकी हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी ने मनरेगा की आलोचना की है। 2015 में संसद में बोलते हुए, भावी हिंदू नेता ने इस योजना को कांग्रेस सरकार की 'विफलता' का प्रतीक बताया था। इसके बाद, उनकी सरकार ने मुख्य रूप से फ़ंड में भारी कटौती करके इस कार्यक्रम को पंगु करने के प्रयास शुरू कर दिए। 18 जनवरी, 2024 को आउटलुक ने रिपोर्ट किया कि एक संसदीय समिति ने भारतीय संसद के निचले सदन, लोकसभा को बताया कि मनरेगा के बजट में कटौती से ग्रामीण रोज़गार गंभीर रूप से प्रभावित होगा। समिति ने इस कटौती का कारण न बता पाने के लिए ग्रामीण विकास विभाग की आलोचना की और बकाया मज़दूरी और सामग्री देनदारियों का मुद्दा उठाया। समिति ने कार्यक्रम की बढ़ती मांग के बावजूद, 2022-23 वित्तीय वर्ष के लिए सरकार के संशोधित अनुमानों में 29,400 करोड़ रुपये (3.2-3.3 अरब डॉलर) की कटौती का ज़िक्र किया।

यह योजना जब शुरू की गई थी तो इसका मकसद था कि गंभीर ग्रामीण संकट से निपटने में मदद करना क्योंकि बढ़ते कर्ज़ और गिरती जीवन स्थितियों के बीच 1997 के बाद के एक दशक में 25,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। ये हालात 1990 के दशक की शुरुआत से कांग्रेस पार्टी और बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा अपनाई गई शोषणकारी बाज़ार-समर्थक नीतियों से जुड़ी हुई थीं। इस कार्यक्रम ने तब एक राजनीतिक ढाल के रूप में काम किया जब स्टालिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी सीपीआई, भारतीय संसद में यूपीए सरकार का समर्थन कर रही थीं और सरकार की नवउदारवादी 'सुधारों' की निरंतरता को छिपाने में मदद कर रही थीं। जबकि ये नवउदारवादी सुधार ग्रामीण ग़रीबी और आर्थिक असुरक्षा और भारत के तेज़ी से विकास कर रहे शहरी केंद्रों में अमीरी ग़रीबी की खाई को बढ़ा रहे थे।

शुरुआत से ही मनरेगा की कई सीमाएं थीं और इसका उद्देश्य भी अंतिम उपाय के रूप में इसे इस्तेमाल करने का था। पहली सीमा तो यही थी कि शहरी गरीबों को पूरी तरह से बाहर रखा गया; 'परिवार' की एक संकीर्ण परिभाषा बनाई गई जिसके कारण एक ही राशन कार्ड साझा करने वाले बड़े संयुक्त परिवारों को नुकसान होता था; और मृत्यु या स्थायी विकलांगता के लिए 25,000 रुपये की अधिकतम क्षतिपूर्ति सीमा तय की गई थी। हालांकि अधिनियम में 60 रुपये की दैनिक मज़दूरी का ज़िक्र किया गया था, लेकिन सरकार ने इसे राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से जोड़ दिया था, जो आमतौर पर कम थी और कुछ क्षेत्रों में तो मात्र 19 रुपये (0.50 अमेरिकी डॉलर से भी कम) प्रति दिन थी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार, 13 फ़रवरी, 2025 को वॉशिंगटन में व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। (एपी फ़ोटो/एलेक्स ब्रैंडन) [AP Photo/Alex Brandon]

मोदी सरकार अपने वीबी-जी राम जी बिल को 'सुधार' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है, और कह रही है कि सरकार सालाना गारंटी वाले काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर रही है। यह सरासर धोखा है।

पहले तो, जो अधिकांश भारतीय इस समय मनरेगा में काम पाने के लिए अधिकृत हैं उन्हें भी और कभी भी सालाना तौर पर 100 दिन काम नहीं मिल पाता। पिछले दो सालों में सिर्फ सात प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिन का काम मिल पाया।

दूसरा, सरकार खुद को अधिकार दे रही है कि वो चाहे तो इस स्कीम को कुछ ज़िलों तक सीमित कर दे। जबकि मनरेगा भारत के हर ग्रामीण ज़िले को कवर करता था, जहां पंजीकृत परिवार स्थानीय प्रशासन से काम की मांग कर सकता था। लेकिन केंद्र सरकार के पास अब मनमाना अधिकार है कि वो किस इलाक़े को 'अधिसूचित' करती है। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार के पास पावर है कि वो किसी इलाक़े को पूरी तरह इस अधिसूचना से बाहर कर दे।

तीसरा, वीबी-जी राम जी के तहत रोज़गार गारंटी की योजना को खेती के व्यस्त मौसम वाले 60 दिनों के दौरान निलंबित कर दिया जाएगा। यानी यह उन दो महीनों के दौरान 'रोज़गार गारंटी' के तहत काम पाने के अधिकार पर रोक लगाता है जब बुवाई, रोपाई और कटाई में सबसे अधिक काम होता है।

सरकार इसे यह कहकर सही ठहराती है कि इससे पूरे साल रोज़गार स्थिर रहेगा। खेती के मौसम में गारंटी निलंबित करने का वास्तविक उद्देश्य और प्रभाव खेतिहार मज़दूरों की मज़दूरी को कम करना होगा।

खेती के व्यस्त मौसम के दौरान सार्वजनिक रोज़गार को निलंबित करके, राज्य एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक नियोक्ता को हटा देता है, जिससे मज़दूरों की सौदेबाजी की ताक़त कमज़ोर हो जाती है। इससे श्रम को निजी बाज़ारों में वापस धकेल दिया जाता है, जब मांग सबसे अधिक होती है, जिससे आपूर्ति बढ़ जाती है, मज़दूरी नहीं बढ़ती और नियोक्ताओं की मनमानी बढ़ जाती है, जिससे यह प्रावधान प्रभावी रूप से मज़दूरी कम करने के तंत्र में बदल जाता है। ग्रामीण विकास मंत्री चौहान ने इस बात पर जोर देते हुए कि यह नई योजना का एक केंद्रीय उद्देश्य है और दावा किया कि नया क़ानून सस्ते श्रम की निरंतर आपूर्ति के मुद्दे को हल करेगा और कहा कि कृषि के व्यस्त मौसम के दौरान 'श्रमिक अब उपलब्ध होंगे।'

शुरू में मनरेगा को एक मांग आधारित प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसकी फ़ंडिंग को मांग के आधार पर बढ़ाया जा सकता है और रोज़गार के दिनों पर कोई सीमा आयद नहीं थी। जबकि बीजेपी के ”सुधार” में तयशुदा, राज्यवार बजट आवंटन का प्रावधान है जो खर्च और काम के दिनों दोनों पर सीमा लगाता है। केंद्र और राज्य सरकार के साझा लागत का अनुपात भी 90:10 की बजाय 60:40 हो गया है, जिससे राज्य पर वित्त का भार बढ़ेगा। अगर फ़ंड बीच में ही समाप्त हो गया तो ज़रूरत के बावजूद काम देने से इनकार किया जा सकता है, जिससे यह प्रोग्राम एक क़ानूनी अधिकार को केंद्र द्वारा नियंत्रित, सीमित संसाधनों वाली कल्याणकारी योजना में बदल देता है।

भ्रष्टाचार से निपटने के नाम पर, बीजेपी सरकार प्रोग्राम को अपने हाथ में ले रही है, जो इसे अधिकार देता है कि वो चाहे तो इस मदद को कम कर दे और चाहे तो अपने संपर्क वाले नेटवर्कों को ही फ़ायदा पहुंचाने वाले कार्यक्रम में बदल दे। सिंचाई के टैंक, मिट्टी संरक्षण या ग्रामीण सड़क निर्माण जैसे स्थानीय स्तर की ज़रूरतों के आधार पर तय करने की बजाय, सरकार बड़े उद्योगों की ज़रूरतों के लिए ढांचा खड़ा करने में इसका इस्तेमाल करने में सक्षम हो जाएगी।

द हिंदू में छपे एक लेख के अनुसार, ये घटनाक्रम एक व्यापक 'धीरे-धीरे करके ख़त्म करने' की रणनीति का हिस्सा हैं: 'मनरेगा को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय, सरकार धीरे-धीरे बदलाव कर रही है—कवरेज को सीमित करना, बजट पर सीमा लगाना, भुगतान में देरी करना, वित्तीय बोझ को राज्यों पर थोपना, व्यस्त मौसमों के दौरान काम रोकना और योजना का केंद्रीकरण करना—जो सामूहिक रूप से योजना की प्रभावशीलता को कम कर रहे हैं। कार्यक्रम का क़ानूनी अस्तित्व प्रतीकात्मक रह गया है, जो मज़दूरों के मौलिक अधिकारों के हनन को छिपा रहा है।'

ग्रामीण रोज़गार गारंटी कार्यक्रम को ख़त्म करना मोदी सरकार के उस अभियान का हिस्सा है जिसके तहत मज़दूरों का शोषण तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है और सरकारी संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े उद्योगों को टैक्स में छूट देने और भारत की सेना को भारी मजबूती देने में लगाया जा रहा है। हाल के हफ्तों में, सरकार ने भारत के श्रम क़ानूनों में व्यापक बदलाव किए हैं, जिससे बड़े नियोक्ताओं के लिए बड़े पैमाने पर छंटनी और कारखाने बंद करना, असुरक्षित कांट्रैक्ट लेबर को बढ़ावा देना और हड़तालों पर रोक लगाना आसान हो गया है। साथ ही, सरकार सांप्रदायिकता को भड़का रही है, ख़ासकर मुसलमानों को निशाना बनाकर, ताकि बढ़ते सामाजिक आक्रोश को मोड़ा जा सके, मज़दूर वर्ग को बांटा जा सके और आरएसएस के नेतृत्व वाले संघ परिवार में अपने धुर दक्षिणपंथी समर्थकों को मजबूत किया जा सके।

राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा कोई गुट नहीं है जो इस वर्ग-संघर्ष के हमले के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग को संगठित करने के लिए तैयार या सक्षम हो। 17 दिसंबर को, स्टालिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी ने सीपीआई, सीपीआई (एमएल) लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक सहित अन्य स्टालिनवादी और माओवादी दलों के साथ एक संयुक्त बयान प्रकाशित किया, जिसमें 22 दिसंबर को मनरेगा में किए गए बदलावों के ख़िलाफ़ 'अखिल भारतीय विरोध दिवस' ​​का आह्वान किया गया। बयान में दावा किया गया कि यह योजना 2006 में यूपीए सरकार द्वारा 'वामपंथी' दबाव के कारण लागू की गई थी, और हास्यास्पद रूप से बीजेपी से ही इसे सार्वभौमिक बनाकर 'मजबूत' करने की अपील की गई। ये दल जो बड़े उद्योग परस्त कांग्रेस पार्टी के वफादार सहयोगी हैं, मज़दूर वर्ग या ग्रामीण ग़रीबों को संगठित करने में विफल रहे। 22 दिसंबर की कार्रवाई छिटपुट स्थानीय विरोध प्रदर्शनों तक ही सीमित थी, जो 2029 में होने वाले अगले आम चुनाव में मोदी सरकार को एक ऐसे वैकल्पिक दक्षिणपंथी पूंजीवादी शासन से बदलने के प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण पर आधारित थी, जो बाज़ार समर्थक 'सुधार' और चीन विरोधी भारत-अमेरिका 'वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' के लिए प्रतिबद्ध हो।

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