यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India’s India’s budget combines austerity for working people with huge boosts in military spending and business subsidies का है जो 16 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित हुआ था।
भारत की दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाली सरकार ने एक अप्रैल से शुरू हो रहे वित्त वर्ष के लिए ऐसा बजट पेश किया है, जिसमें कामकाजी लोगों के लिए सख्ती बढ़ाने के साथ सैन्य खर्च में 15 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी और बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए भारी सब्सिडी व रियायतें शामिल हैं।
ट्रंप की टैरिफ नीति समेत वैश्विक रणनीतिक टकराव और बढ़ती आर्थिक अस्थिरता के बीच भारतीय पूंजीपति वर्ग ने मज़दूर वर्ग और ग्रामीण ग़रीबों के शोषण को और तेज़ करने का फ़ैसला किया है।
बजट से पहले सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को समाप्त करने के लिए कानून पेश किया। यह योजना पिछले दो दशकों से करोड़ों छोटे किसानों और कृषि मजदूरों के लिए सहारा रही है। नई योजना में अब राज्य पर यह क़ानूनी ज़िम्मेदारी नहीं होगी कि हर ग्रामीण परिवार के एक सदस्य को साल में 100 दिन का अकुशल काम दे। केंद्र सरकार ने ग्रामीण राहत कार्यक्रम की फंडिंग का बड़ा हिस्सा पहले से आर्थिक दबाव झेल रही राज्य सरकारों पर डाल दिया है। इसके अलावा ग्रामीण मजदूरी को कम रखने के उद्देश्य से नई योजना को कृषि सीज़न के 60 व्यस्त दिनों में पूरी तरह निलंबित रखा जाएगा।
बीजेपी सरकार ने व्यापक श्रम सुधार लागू करना भी शुरू कर दिया है। इन सुधारों में न्यूनतम कार्यस्थल मानकों और उनकी निगरानी व्यवस्था को ढीला किया गया है। ठेका मज़दूरी को बढ़ावा दिया गया है और बड़े कारखानों को छोड़कर बाकी जगहों पर सामूहिक छंटनी पर लगी पाबंदियां हटाई गई हैं। मज़दूरों की हड़ताल को सीमित करने के उद्देश्य से नए श्रम क़ानून में हड़ताल के क़ानूनी अधिकार पर कई नई शर्तें भी जोड़ी गई हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी लंबे समय से भारत को सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताते रहे हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट से जूझ रही है और पिछले एक दशक में निजी क्षेत्र का निवेश गिर गया है या ठहरा हुआ है।
आर्थिक वृद्धि का लाभ मुख्य रूप से सुपर अमीर और उच्च मध्यम वर्ग तक सीमित है। करोड़ों लोग बेरोज़गार या आंशिक रूप से रोज़गार में हैं। भारत के आर्थिक आंकड़ों में स्व रोज़गार की बढ़ोतरी इस स्थिति को आंशिक रूप से छिपाती है। यह बढ़ोतरी कोविड 19 महामारी के दौरान नई दिल्ली की ग़लत नीतियों के कारण हुई, जब बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर शहरों से अपने ग्रामीण घरों की ओर लौट गए।
बड़े कारोबार और उद्योगपतियों को बढ़ावा
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में अपने बजट भाषण की शुरुआत सामान्य औपचारिक बयानों से की। उन्होंने कहा, “हमारी सरकार का संकल्प ग़रीब, वंचित और पिछड़े लोगों पर ध्यान केंद्रित करना है।”
इसके बाद उन्होंने ऐसा बजट पेश किया जिसमें समाज के संसाधनों का बड़ा हिस्सा सेना और कॉरपोरेट क्षेत्र के हवाले कर दिया गया। रोज़गार बढ़ाने और ट्रंप की टैरिफ़ नीति के प्रभाव से निपटने के नाम पर सरकार ने विभिन्न योजनाओं के तहत छोटे, मध्यम और बड़े उद्योगों को दी जाने वाली सीधी सब्सिडी फिर बढ़ाई है। साथ ही नियमों को कमज़ोर कर कारोबारी माहौल को आसान बनाने पर जोर दिया गया है।
मोदी और सीतारमण ने सरकारी फंड से बनने वाले, निजी क्षेत्र द्वारा तैयार और कई बार संचालित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाकर कॉरपोरेट क्षेत्र को अतिरिक्त समर्थन दिया है।
इस बीच सामाजिक खर्च यानी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पानी और सीवर व्यवस्था, पोषण, वृद्धावस्था पेंशन, राशन पर सब्सिडी और ग्रामीण विकास पर होने वाला खर्च बजट के कुल खर्च के अनुपात में लगातार घट रहा है। जब 2014 में मोदी और बीजेपी सत्ता में आए थे, तब सामाजिक क्षेत्र पर केंद्रीय सरकारी खर्च का 22 प्रतिशत हिस्सा जाता था, जो जीडीपी का 2.9 प्रतिशत था। वित्त वर्ष 2026–27 के बजट में यह घटकर 18 प्रतिशत रह गया है, जो जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है। इस दौरान भारत की आबादी में अनुमानित 14 करोड़ यानी 10.5 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
बजट का मुख्य आर्थिक लक्ष्य कम निजी निवेश की भरपाई के लिए सरकारी पूंजीगत खर्च बढ़ाकर तेज आर्थिक वृद्धि के भ्रम को बनाए रखना है। वित्त वर्ष 2026–27 में सरकारी पूंजीगत खर्च के लिए 12.2 लाख करोड़ रुपये यानी 136 अरब डॉलर का प्रावधान किया गया है, जो चालू वित्त वर्ष से 11 प्रतिशत अधिक है।
सरकार जिस मॉडीनॉमिक्स की सफलता का दावा करती है, उसके विपरीत भारी कॉरपोरेट टैक्स कटौती और निवेशक परस्त सुधारों के बावजूद सालों से निजी निवेश गिरा है या ठहरा हुआ है। बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट को टालने और निजी निवेश को बढ़ावा देने की उम्मीद में बीजेपी सरकार ने लगातार बजट में बड़े पैमाने पर पूंजीगत खर्च का सहारा लिया है।
अब तक यह प्रयास स्पष्ट रूप से सफल नहीं हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, निजी निवेश 2024–25 में 7 लाख करोड़ रुपये यानी 78 अरब डॉलर से घटकर चालू वित्त वर्ष में अनुमानित 5 लाख करोड़ रुपये यानी 58 अरब डॉलर रह गया है, जो 29 प्रतिशत की गिरावट है।
मोदी, सीतारमण और भारतीय पूंजीपति वर्ग परिवहन, ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को इस लक्ष्य के लिए अहम मानते हैं कि भारत को अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर चीन के विकल्प के रूप में उत्पादन केंद्र बनाया जाए। हालांकि अब तक इस दिशा में प्रगति सीमित रही है। तेज़ आर्थिक वृद्धि के दावों के बावजूद मैन्यूफ़ैक्चरिंग क्षेत्र दशकों से जीडीपी के लगभग 15 से 17 प्रतिशत के बीच ठहरा हुआ है। कैपेसिटी यूटिलाइजेशन यानी क्षमता उपयोग, जो उपलब्ध उत्पादन क्षमता के इस्तेमाल का प्रतिशत है, 75 प्रतिशत से नीचे है।
अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने आने वाले वित्त साल के लिए वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया है। इसके मुकाबले 31 मार्च को समाप्त हो रहे 2025–26 वित्त वर्ष में यह दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सेहत का अहम पैमाना बताते हैं। हालांकि भारत की आर्थिक उन्नति, जिसके चलते वह अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, का लाभ मुख्य रूप से बड़े उद्योगपतियों, विदेशी निवेशकों और कॉरपोरेट प्रमुखों को मिला है, जबकि मज़दूरों और ग्रामीण मज़दूरों को इसका फायदा कम मिला है। सरकार के अपने घरेलू उपभोग सर्वे के अनुसार 1.1 अरब से अधिक आबादी में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग प्रतिदिन 3 डॉलर से कम पर जीवन यापन करते हैं, जो विश्व बैंक की 3.20 डॉलर प्रतिदिन की ग़रीबी रेखा से भी नीचे है। इसके उलट देश के शीर्ष 100 सबसे अमीर लोगों की कुल संपत्ति 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है, जो भारत की जीडीपी का लगभग 30 प्रतिशत है।
बजट का एक और प्रमुख पहलू भारत के कर्ज और उस पर होने वाले भुगतान में तेज़ बढ़ोतरी है। घाटा वित्तपोषण कुल बजट खर्च का लगभग 23 प्रतिशत है, जो वित्त वर्ष 2017–18 में सरकारी उधारी के 12.3 प्रतिशत हिस्से की तुलना में लगभग दोगुना है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार 2024–25 में भारत सरकार का कुल कर्ज जीडीपी के 81 प्रतिशत से थोड़ा अधिका था, जबकि 2015–16 में यह 69 प्रतिशत था।
बढ़ते कर्ज के कारण ब्याज भुगतान, जो 14 लाख करोड़ रुपये यानी 155.6 अरब डॉलर से अधिक है, बजट का सबसे बड़ा एकल खर्च बन गया है। केवल तीन मद, ब्याज भुगतान, पूंजीगत या बुनियादी ढांचा खर्च और सैन्य बजट मिलकर कुल बजट का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा ले लेते हैं।
रिकॉर्ड सैन्य खर्च
बजट में सेना के लिए 7.9 लाख करोड़ रुपये यानी 88 अरब डॉलर का प्रावधान किया गया है। इससे भारत का सैन्य बजट दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा हो जाता है, जो अमेरिका, चीन, रूस और जर्मनी के बाद है।
यह आवंटन अनुमानित जीडीपी का 2 प्रतिशत है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की तुलना में सैन्य खर्च में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी सैन्य आधुनिकीकरण के कारण है। सशस्त्र बलों ने पिछले मई में पाकिस्तान के ख़िलाफऱ शुरू किए गए चार दिन के सीमा संघर्ष, जिसे ऑपरेशन सिंदूर कहा गया, से लिए गए सबक को लागू करने की बात कही है। यह संघर्ष ने दक्षिण एशिया की परमाणु शक्तियों को व्यापक युद्ध की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था।
हथियारों की खरीद के लिए 2.2 लाख करोड़ रुपये यानी 24 अरब डॉलर का प्रावधान है, जिसमें विमान, मिसाइल और नौसैनिक जहाज शामिल हैं। यह राशि लगभग उतनी ही है जितनी 2026–27 के बजट में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए 2.3 लाख करोड़ रुपये यानी 26 अरब डॉलर रखी गई है। इस प्रणाली पर कम से कम 80 करोड़ लोग अनाज, चीनी और मिट्टी तेल जैसी सब्सिडी वाली आवश्यक वस्तुओं के लिए निर्भर हैं।
साल 2000 में जहां भारत का रक्षा बजट लगभग 13 अरब डॉलर था, वहीं अब यह पांच गुना से अधिक बढ़ चुका है। नौसेना और परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता सहित सैन्य ताकत का विस्तार नई दिल्ली का प्रमुख लक्ष्य रहा है, चाहे सरकार बीजेपी की हो या कांग्रेस की। यह अमेरिका के साथ चीन विरोधी रणनीतिक साझेदारी का अहम हिस्सा है।
मोदी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान पर बढ़त स्थापित करने की आक्रामक कोशिश की है। साथ ही वॉशिंगटन और उसके एशिया प्रशांत सहयोगियों जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और चतुष्पक्षीय रणनीतिक संबंधों का व्यापक नेटवर्क बनाया है। भारतीय नीति निर्माताओं की रणनीति के अनुसार सेना को चीन और पाकिस्तान के खिलाफ एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।
मोदी सरकार और भारत के शासक वर्ग ने ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी का स्वागत किया। लेकिन टैरिफ नीति और रूस से तेल आयात रोकने जैसे दबावों ने भारत अमेरिका संबंधों में अस्थिरता पैदा की है।
ट्रंप प्रशासन को संतुष्ट करने के प्रयास में सीतारमण ने अपने बजट भाषण में इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, सेमीकंडक्टर और अन्य वस्तुओं पर टैरिफ में कटौती की घोषणा की। अगले ही दिन ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ पर दावा किया कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच व्यापार समझौता हो गया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के 50 प्रतिशत टैरिफ को 19 प्रतिशत तक घटाने के बदले भारत ने कई रियायतें दी हैं, जिनमें रूसी तेल आयात रोकने और अमेरिकी कृषि उत्पादों के बड़े पैमाने पर आयात का रास्ता खोलना शामिल है।
बाद में नई दिल्ली ने सिद्धांत रूप में समझौते की पुष्टि की, लेकिन दोनों पक्षों ने माना कि कई अहम बिंदुओं पर अभी सहमति बाकी है। भारतीय अधिकारियों ने संकेत दिया है कि रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद करने को लेकर कोई ठोस वचन नहीं दिया गया है। पिछले चार वर्षों में रियायती दर पर रूसी तेल ने भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है।
इसी बीच संभावित समझौते में अमेरिकी कृषि कारोबार को दी गई रियायतों के ख़िलाफ़ ग्रामीण भारत में विरोध बढ़ रहा है। हालांकि कृषि क्षेत्र का जीडीपी में हिस्सा 18 प्रतिशत से कम है, लेकिन 45 प्रतिशत से अधिक लोगों का जीवन यापन और रोज़डगार इससे जुड़ा हुआ है.
