यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India fully complicit in US-Israeli war of aggression on Iran का है जो 19 मार्च 2026 को प्रकाशित हुआ था।
भारत की धुर दक्षिणपंथी, हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी सरकार और संपूर्ण भारतीय सत्ताधारी वर्ग उस आक्रामक और आपराधिक युद्ध में पूरी तरह भागीदार है जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद और इसका इसराइली अटैक डॉग 28 फ़रवरी से ही ईरान के ख़िलाफ़ छेड़े हुए है।
अमेरिका और इसराइल ने एक के बाद एक युद्ध अपराध का पहाड़ खड़ा कर दिया, ईरान के शीर्ष नेताओं और तकरीबन 2000 आम लोगों की हत्या; स्कूलों, अस्पतालों, डीसैलिएशन प्लांटों (समुद्री पानी से पीने लायक पानी बनाने का प्लांट) और अन्य सार्वजनिक आधारभूत ढांचाओं पर बमबारी; हथियारविहीन आईआरएनएस देना को हिंद महासागर में तब डूबो दिया जब वह भारत की अगुवाई वाले एक नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था।
नई दिल्ली ने केवल राजशाही-निरंकुश खाड़ी राज्यों के साथ ही 'एकजुटता' व्यक्त की है, जो अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेज़बानी करते हैं जिनका इस्तेमाल ईरान की निगरानी और उस पर हमला करने के लिए किया जा रहा है।
नई दिल्ली ने जिस एकमात्र देश की निंदा की है, वो है ईरान, जिसने ख़ुद की रक्षा करने की हिम्मत दिखाई है.
पिछले हफ़्ते अमेरिकी सरपरस्ती वाले 'जंग समर्थक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव' का भारत सह प्रायोजक था। प्रस्ताव संख्या 2817 ने अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए अवैध, बिना उकसावे के बड़े पैमाने पर बमबारी और उसके नेताओं के ख़िलाफ़ किए गए 'विध्वंसक' हमलों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, ताकि तेहरान को हमलावर के रूप में चित्रित किया जा सके और ईरानी राज्य और उसके 9.3 करोड़ लोगों के ख़िलाफ़ चल रहे विनाशकारी युद्ध को अंतरराष्ट्रीय वैधता का जामा पहनाया जा सके। वॉशिंगटन के खाड़ी देशों के सहयोगियों पर तेहरान द्वारा किए गए जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों का हवाला देते हुए, भारत द्वारा प्रायोजित प्रस्ताव में पीड़ित, ईरान पर अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करने और 'अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा' को ख़तरा पहुंचाने का आरोप लगाया गया।
भारत द्वारा अपने तथाकथित ईरानी सहयोगी को निर्ममतापूर्वक त्याग देना, कम से कम, आश्चर्यजनक नहीं है। इसी प्रकार, उसने पिछले जून में अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की निंदा करने से भी इनकार कर दिया था - जो कि वर्तमान हमले की तरह ही राजनयिक वार्ताओं की आड़ में किया गया था।
पिछले 25 सालों से, बीजेपी और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारों के तहत, नई दिल्ली ने भारत-अमेरिका वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के तहत सैद्धांतिक रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ अपने गठबंधन को अपनी विदेश नीति और भू-राजनीतिक रणनीति का आधार बनाया है। चीन के ख़िलाफ़ वॉशिंगटन के सैन्य-रणनीतिक आक्रमण में एक संतुलन, और तेज़ी से एक अग्रिम चौकी वाले राज्य के रूप में काम करके, भारतीय पूंजीपति वर्ग ने महाशक्ति बनने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
इस प्रतिक्रियावादी गठबंधन के अनुरूप, भारत, विशेष रूप से भावी हिंदू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, इसराइल के साथ आर्थिक और सैन्य-सुरक्षा संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। दरअसल, मोदी ने इसराइल के साथ भारत की 'रणनीतिक साझेदारी' को मजबूत करने और यहूदीवादी शासन के प्रति अपनी सरकार की सहानुभूति प्रदर्शित करने का विकल्प चुना, जबकि ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू खुलेआम ईरान पर युद्ध छेड़ने की तैयारी कर रहे थे। मोदी ने 25-26 फ़रवरी को इसराइल का दौरा किया और ईरान पर मिसाइलों और बमों की बारिश शुरू होने से 48 घंटे से भी कम समय पहले वहां से वापस हुए थे।
फिर भी, ईरान के ख़िलाफ़ जंग में भारतीय सरकार और पूंजीपति वर्ग की मिलीभगत को दस्तावेज़ी रूप से दर्ज करने में कुछ महत्व तो है ही।
पहला तो ये कि, मोदी सरकार अपनी भूमिका और उन बर्बरताओं को छुपाने के लिए बेचैन है जिन्हें वह और भारतीय शासक वर्ग, अमेरिकी साम्राज्यवाद के जूनियनर पार्टनर के रूप में स्वीकार करने और उनमें हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं।
वे इस बात से अवगत हैं कि भारतीय लोगों में, जिन्होंने दो शताब्दियों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को सहा है, विशेष रूप से मज़दूर वर्ग में, एक अंतर्निहित जन साम्राज्यवाद-विरोधी भावना मौजूद है।
उन्हें भारतीय और विश्व अर्थव्यवस्था पर युद्ध के प्रभाव का भी डर है, क्योंकि ऐसी परिस्थितियां हैं जिसमें ट्रंप के वैश्विक टैरिफ़ युद्ध ने पहले ही भारत की विकास दर को तेज़ी से धीमा कर दिया है, और बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी और स्थानीय ग़रीबी और भूख को लेकर सामाजिक आक्रोश बढ़ रहा है।
भारत फारस की खाड़ी क्षेत्र से तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। मोदी सरकार ने आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए औद्योगिक और वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं से एलपीजी की आपूर्ति को उन घरों की ओर मोड़ दिया है, जो इसका उपयोग खाना पकाने के लिए करते हैं। इनमें से कई वाणिज्यिक प्रतिष्ठान छोटे पारिवारिक व्यवसाय हैं, जिन्हें या तो अपने संचालन के घंटे कम करने पड़े हैं या कम से कम आंशिक रूप से बंद करना पड़ा है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने और क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के बाधित होने से न केवल भारत में ऊर्जा की क़ीमतों में भारी वृद्धि होगी, जिससे खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों पर असर पड़ेगा, बल्कि यूरिया की क़ीमत भी बढ़ जाएगी, जिसे प्रमुख रूप से खाड़ी देशों से आयात किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय कामगारों द्वारा प्रतिवर्ष घर भेजे जाने वाले 50 अरब डॉलर के रेमिटेंस में भी भारी गिरावट आने की संभावना है।
जनता के गुस्से को शांत करने के लिए, सरकार, एक चापलूस कॉर्पोरेट मीडिया की मदद से, इस झूठ को बढ़ावा दे रही है कि भारत एक तटस्थ, तीसरा पक्ष है, जो शांति के लिए और राज्य संप्रभुता सहित अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए काम कर रहा है।
भारत के साम्राज्यवादी सहयोगी के रूप में आपराधिक भूमिका को उजागर करना, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) या सीपीएम और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) के नेतृत्व में भारत के स्टालिनवादी 'वामपंथ' के दुर्भावनापूर्ण राजनीतिक प्रभाव को ध्वस्त करने में भी बहुत अहमियत रखता है।
ऐसा करना मज़दूर वर्ग पर आधारित एक वास्तविक युद्ध-विरोधी आंदोलन के विकास और साम्राज्यवाद और संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए एक समाजवादी-अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण है।
स्टालिनवादियों का दावा है कि भारतीय पूंजीपति वर्ग और उसका राज्य विश्व राजनीति में एक 'प्रगतिशील' भूमिका निभा सकता है, बशर्ते यह मोदी के नेतृत्व में नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली एक वैकल्पिक दक्षिणपंथी पूंजीवादी सरकार के तहत हो।
युद्ध पर उनकी तत्काल प्रतिक्रिया मोदी सरकार से इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताते हुए इसकी निंदा करने का आह्वान करना था, मानो वह ऐसा करेगी ही, क्योंकि भारत ने अमेरिका और इसराइल दोनों के साथ अपने सैन्य-सुरक्षा संबंधों का व्यापक विस्तार किया है और अगर वह ऐसा करती भी है, तो यह एक खोखला इशारा ही होगा।
सीपीएम पोलित ब्यूरो के एक अधिक ठोस बयान में, भारतीय पूंजीपति वर्ग के नज़रिये से तर्क देते हुए, बाद में चेतावनी दी गई कि अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ मोदी सरकार का गठबंधन भारत के अपने 'राष्ट्रीय हितों' में बाधा पैदा कर रहा है।
जंग शुरू होने पर बीजेपी सरकार लगभग पूरी तरह चुप रही। उसकी एकमात्र टिप्पणी एक हास्यास्पद तीन वाक्यों का बयान था जिसमें अमेरिका या इसराइल का कोई ज़िक्र नहीं था, ईरान के ख़िलाफ़ उनके खुले आक्रमण की निंदा करना तो दूर की बात थी। उसने सभी पक्षों से 'संयम बरतने' और 'तनाव बढ़ने से बचने' का आग्रह किया - संक्षेप में, तेहरान से अमेरिका-इसराइल के हमले को चुपचाप सहने की अपील थी।
न तो उस समय और न ही उसके बाद के दिनों में, नई दिल्ली ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई की हत्या करने वाले उस हमले की निंदा की, जो ईरान के राष्ट्राध्यक्ष होने के साथ-साथ दुनिया भर में लाखों शिया मुसलमानों के एक शीर्ष आध्यात्मिक नेता भी थे। न ही उसने मीनाब के एक प्राथमिक विद्यालय में 175 स्कूली छात्राओं और उनके शिक्षकों की हत्या करने वाले अमेरिकी हमले की निंदा की।
बीजेपी सरकार को ख़ामेनेई के लिए शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने के लिए विदेश सचिव विक्रम मिसरी को नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास भेजने में पांच दिन लग गए। इसके बाद ही भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची से फ़ोन पर बात की, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नई दिल्ली को यह बताया गया होगा या समझाया गया होगा कि इस मामूली सांकेतिक क़दम के बिना उच्च स्तरीय संपर्क असंभव होगा।
यह सब खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए ईरान के जवाबी हमलों पर बीजेपी सरकार की प्रतिक्रिया के बिल्कुल विपरीत है। रविवार, 1 मार्च को, मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति से व्यक्तिगत रूप से संवेदना व्यक्त करने के बाद उसी दिन हुए हमले की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया, जिसमें कथित तौर पर चार लोगों की मौत हो गई थी। मोदी ने पोस्ट किया, “संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति, मेरे भाई शेख़ मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से बात की। मैंने संयुक्त अरब अमीरात पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की और इन हमलों में हुई जानमाल की हानि पर शोक व्यक्त किया। भारत इस कठिन समय में संयुक्त अरब अमीरात के साथ एकजुटता से खड़ा है। मैंने संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले भारतीय समुदाय की देखभाल करने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। हम तनाव कम करने, क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता का समर्थन करते हैं।”
इसी तरह, नई दिल्ली ने कभी भी आईआरएनएस देना पर अमेरिकी हमलावर पनडुब्बी द्वारा किए गए गुप्त हमले की निंदा नहीं की है, जिसमें 150 ईरानी नाविक मारे गए थे, जिन्हें क़ानूनी रूप से नहीं तो नैतिक रूप से भारतीय सरकार की सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, क्योंकि वे दुनिया भर के नाविकों के साथ भारतीय सैन्य नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के तुरंत बाद लौटे थे।
भारतीय सैन्य और राष्ट्रीय सुरक्षा हलकों में अमेरिकी कार्रवाई को लेकर निराशा है। लेकिन यह निराशा केवल इस नज़रिये से है कि वॉशिंगटन ने भारतीय नौसेना को बिना भरोसे में लिए, भारत के तटों पर मनमानी करने का विकल्प चुना, जबकि पेंटागन भारतीय नौसेना को हिंद महासागर में 'सुरक्षा' प्रदान करने में अपना विश्वसनीय भागीदार बताकर उसकी तारीफ़ करना पसंद करता है।
