यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India roiled by economic shocks from criminal US-Israeli war on Iran का है जो 31 मार्च 2026 को प्रकाशित हुआ था।
ईरान के ख़िलाफ़ एक महीने तक चले उस आपराधिक युद्ध का ख़ामियाजा भारत की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ रहा है, जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके पश्चिम एशिया के अटैक डॉग इसराइल ने छेड़ा है।
जंग का आर्थिक असर पहले ही बहुत गंभीर बन चुका है। पिछले हफ़्ते संसद में एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तुलना कोविड-19 महामारी से की, जिसके चरम पर पहुंचने से भारत की अर्थव्यवस्था 24 प्रतिशत तक सिकुड़ चुकी थी और इसमें 40 लाख से अधिक लोग मारे गए थे।
इस जंग का तत्काल असर भारत के एलपीजी (लिक्विड पेट्रोलियम गैस) सप्लाई पर पड़ा है। एलपीजी सिलेंडर में ब्यूटेन और प्रोपेन होता है और ये सिलेंडर घरों और रेस्टोरेंट में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। सप्लाई बाधित होने से इसके दाम में तेज़ वृद्धि हुई है और इसकी वजह से फ़ुटपाथ पर खाने का कारोबार करने वालों और रेस्टोरेंट वालों को अपने काम के घंटे कम करने पड़े हैं और कई मामलों में तो पूरा उद्योग बंद करना पड़ा है, जिससे दसियों लाख घरों की आमदनी प्रभावित हुई है।
हालांकि जंग का असर एलपीजी से आगे भी बहुत तेज़ी से फैला और इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जिससे महंगाई बढ़ी है ख़ासकर खाने पीने की चीज़ों और यातायात की लागत बढ़ी है।
भारत तेल आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसमें से लगभग आधा या उससे अधिक आयात, यानी लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन, इराक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से होता है। अब तक, युद्ध के कारण दुनिया में तेल की क़ीमतों में आई तेज़ी का असर डीजल और पेट्रोल की क़ीमतों में भारी वृद्धि के रूप में नहीं दिखा है, क्योंकि सरकार ने उत्पाद शुल्क में कमी करने सहित कई उपाय किए हैं। लेकिन अगर आने वाले हफ्तों और महीनों में युद्ध जारी रहता है और सभी संकेत यही बता रहे हैं, तो बीजेपी सरकार, जो सालों से सार्वजनिक खर्च में कटौती के अभियान में लगी हुई है, क़ीमतों में हुई वृद्धि और इसके प्रभाव को कम करने के लिए लिए गए अस्थायी कर्जों का पूरा बोझ भारत के मज़दूरों और मेहनतकशों पर डाल देगी।
भारत फारस की खाड़ी क्षेत्र से नाइट्रोजन उर्वरकों का सबसे बड़ा आयातक है। इस क्षेत्र से दुनिया के यूरिया निर्यात का 45 प्रतिशत या उससे अधिक और अमोनिया के वैश्विक निर्यात का 30 प्रतिशत हिस्सा आता है, जो यूरिया और अन्य नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का एक महत्वपूर्ण घटक है। भारत के यूरिया आयात का कम से कम 75 प्रतिशत और अमोनिया आयात का 80 प्रतिशत हिस्सा आमतौर पर खाड़ी देशों से आता है।
उर्वरक की कमी से खेती की लागत बढ़ेगी और फसल की पैदावार कम होगी, जिससे किसानों की आय पर दबाव पड़ेगा और खाने पीने की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ेंगी, यह ऐसे देश में हो रहा है जहां पहले से ही करोड़ों लोग भूख और खाद्य असुरक्षा से जूझते हैं।
ईरान पर आपराधिक हमले में भारत की संलिप्तता
जहां एक ओर भारत के म़जदूर और मेहनतकश ईरान पर अमेरिका-इसराइल के अवैध और बिना उकसावे वाले हमले की बढ़ती क़ीमत चुका रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत की हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी सरकार और भारतीय शासक वर्ग ने यह साफ़ कर दिया है कि वे वॉशिंगटन और तेल अवीव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।
जंग से ठीक पहले, जब यह सभी के लिए साफ़ हो चुका था कि अमेरिका-इसराइल का हमला आसन्न है, मोदी ने धुर दक्षिणपंथी नेतन्याहू शासन और ग़ज़ा फ़लस्तीनियों पर उसके नरसंहारी हमले के साथ एकजुटता दिखाने और शांति, इनोवेशन और समृद्धि के लिए एक उन्नत भारत-इसराइल 'रणनीतिक साझेदारी' की घोषणा करने के लिए इसराइल की दो दिवसीय यात्रा की।
अमेरिका और इसराइल द्वारा किए गए सभी युद्ध अपराधों को लेकर नई दिल्ली स्पष्ट रूप से चुप रही है, इन अपराधों की शुरुआत बिना उकसावे के आक्रामक युद्ध शुरू करने से हुई, जिसे 1946 के नूरेमबर्ग फ़ैसले के अनुसार 'सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध' माना गया था, जिसके लिए नाज़ी नेताओं को फांसी दी गई थी।
हालाँकि तेहरान ज़ाहिरा तौर पर भारत का सहयोगी है, लेकिन मोदी और बीजेपी सरकार, युद्ध शुरू करने के मक़सद से अमेरिका और इज़राइल की ओर से किए गए हमलों की निंदा करने में विफल रहे हैं। इन हमलों में ईरान के वरिष्ठ नेताओं की हत्या कर दी गई थी, जिनमें आयतुल्लाह ख़ामेनेई भी शामिल थे, जो ईरान के सुप्रीम लीडर होने के साथ-साथ लाखों शिया मुसलमानों द्वारा पूजनीय एक धार्मिक नेता भी थे। भारत ने आईआरआईआईएस देना पर हुए हमले के ख़िलाफ़ भी एक शब्द का विरोध नहीं जताया। इस हमले में भारत द्वारा आयोजित नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे 150 से अधिक ईरानी नाविक मारे गए थे। इस निहत्थे जहाज को श्रीलंका के तट से दूर, ईरान के तटों से 1,000 मील से अधिक की दूरी पर, एक अमेरिकी हमलावर परमाणु पनडुब्बी ने डुबो दिया था।
हालांकि, नई दिल्ली ने ईरान द्वारा आत्मरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की बार-बार निंदा की है। बीजेपी सरकार ने साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ मिलकर तेहरान की निंदा की, क्योंकि उसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया और उन खाड़ी देशों पर जवाबी हमले किए हैं जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे स्थित हैं जिनका इस्तेमाल ईरान को धमकाने और उस पर हमला करने के लिए किया जा रहा है।
सोमवार, 23 मार्च को, मोदी ने संसद में पहली बार ईरान युद्ध और इससे भारत के लिए उत्पन्न होने वाले संभावित आर्थिक संकट के बारे में बात की। उन्होंने पश्चिम एशिया की स्थिति को 'बेहद चिंताजनक' बताया और 'देश' और संसद के सभी सदस्यों से मोदी सरकार का समर्थन करने का आग्रह किया ताकि सरकार इस मुद्दे पर 'एकजुट और सर्वसम्मत आवाज़' में बोल सके।
भारत के हिंदू वर्चस्ववादी प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में, एक बार फिर ईरान पर हमला किया, जोकि ख़ुद आक्रामकता का पीड़ित राष्ट्र है, और भारत की तरह ही ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित देश है। तेहरान के ख़िलाफ़ सीधे तौर पर संबोधित करते हुए, उन्होंने होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही में बाधा की निंदा की, जबकि बिना उकसावे वाले अमेरिकी-इसराइली हमले पर एक लब्ज़ तक नहीं कहा। ये हमले बातचीत के कवर में लॉन्च किए गए थे। पीएम ने ईरान पर मौजूदा बमबारी पर भी मुंह नहीं खोला। उन्होंने घोषणा की कि भारत ने 'नागरिकों, ऊर्जा और परिवहन संबंधी बुनियादी ढांचे पर हमलों का विरोध किया है। कमर्शियल जहाज़ों पर हमले और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में अवरोध पैदा करना अस्वीकार्य है।'
यहां तक कि विपक्षी इंडिया गठबंधन की नेता, बड़े कारोबारों की परस्त कांग्रेस पार्टी ने भी यह बात स्वीकार करना आवश्यक समझा कि मोदी ने 'ईरान पर अमेरिका-इसराइल के उन लगातार हवाई हमलों की निंदा में एक शब्द भी नहीं जाया किया... जिनका उद्देश्य सत्ता परिवर्तन और मौजूदा ईरानी सरकार का तख़्तापलट करना था।' कांग्रेस पार्टी ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत की प्रतिक्रियावादी, चीन-विरोधी 'वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' को बढ़ावा दिया है और उसका दृढ़ता से समर्थन करती है। फिर भी, उसे डर है कि युद्ध और इसके आर्थिक दुष्परिणाम क्षेत्र को और अधिक अस्थिर कर देंगे और विशेष रूप से भारतीय मज़दूर वर्ग के भीतर विरोध को बढ़ावा देंगे, जिनमें व्यापक रूप से साम्राज्यवाद-विरोधी भावना निहित है।
मोदी की टिप्पणियां संयुक्त राष्ट्र में भारत द्वारा अपनाए गए अमेरिका समर्थक युद्ध वाले रुख़ के पूरी तरह अनुरूप थीं, जहां वह सुरक्षा परिषद के उस एक प्रस्ताव का सह प्रायोजक बना था जिसमें ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इसराइल के अवैध हमले का संक्षिप्त उल्लेख भी दबा दिया गया था, जबकि ईरान को आत्मरक्षा करने के लिए हमलावर के रूप में चित्रित किया गया था।
भारत की संसद में जंग पर अपने भाषण के अगले दिन, मोदी ने युद्ध अपराधी और तानाशाह बनने की चाह रखने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फ़ोन पर बात की। मोदी द्वारा एक्स पर किए गए एक पोस्ट के अनुसार, उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि 'पूरी दुनिया' को यह आवश्यकता है कि 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला, सुरक्षित और सुलभ बना रहे।' इस चर्चा से पहले और बाद में, ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फारस की खाड़ी क्षेत्र में भारी संख्या में अमेरिकी सैन्य बलों को तैनात कर रहे हैं और आने वाले दिनों में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को 'फिर से खोलने' के लिए युद्ध को और भी तेज़ करने का इरादा रखते हैं, जिसमें ज़मीनी हमले और ईरानी क्षेत्र पर कब्ज़ा करना शामिल है, जिसमें संभवतः हज़ारों और यहां तक कि लाखों लोगों की जान जा सकती है।
ट्रंप और मोदी की बातचीत के बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप का प्रधानमंत्री मोदी के साथ बहुत बढ़िया रिश्ते हैं और यह बहुत रचनात्मक बातचीत थी।'
पिछले सप्ताह के अंत में, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संकेत दिया था कि नई दिल्ली जलडमरूमध्य की 'सुरक्षा' सुनिश्चित करने के लिए यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों और जापान के साथ तालमेल वाली कार्रवाई पर चर्चा कर रही है। जयशंकर ने फ़्रांस द्वारा आयोजित जी7 विदेश मंत्रियों की बैठक में विशेष आमंत्रित मेहमान के रूप में भाग लेते हुए अपने फ़्रांसीसी समकक्ष और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की। ब्रिटेन और फ़्रांस पहले ही इस क्षेत्र में व्यापक सैन्य साजो-सामान तैनात कर चुके हैं और ईरान द्वारा उन देशों पर किए जा रहे हमलों का मुकाबला करने के लिए 'रक्षात्मक अभियान' चला रहे हैं जो ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी जंग में सहयोग कर रहे हैं।
जयशंकर की यात्रा के दौरान, फ़्रांसीसी नौसेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ एडमिरल निकोलस वौजोर ने रॉयटर्स को बताया कि उन्होंने हाल ही में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, भारत और जापान सहित विभिन्न नौसैनिक समकक्षों के साथ पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर 'अपने विश्लेषण साझा करने और अपनी कार्रवाई में तालमेल करने' के लिए बातचीत की थी।
साम्राज्यवादी जंग और मज़दूर वर्ग का तीव्र शोषण
महत्वाकांक्षी महाशक्ति बनने की अपनी चाहत में, भारतीय पूंजीपति वर्ग ने पिछले 25 सालों में अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ और भी घनिष्ठ संबंध स्थापित कर लिए हैं, साथ ही सैन्य खर्च में भी भारी बढ़ोत्तरी की है। अमेरिका और उसके प्रमुख एशिया-प्रशांत सहयोगी देशों, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और चतुर्पक्षीय सैन्य-सुरक्षा संबंधों का एक विशाल नेटवर्क विकसित करके, मोदी के 12 सालों के शासनकाल में भारत, चीन के ख़िलाफ़ वॉशिंगटन के सैन्य-रणनीतिक आक्रमण में एक महत्वपूर्ण अग्रिम पंक्ति का देश बन गया है। इसके फलस्वरूप, नई दिल्ली ने इसराइल के साथ भी व्यापक सैन्य-सुरक्षा और आर्थिक संबंध विकसित किए हैं।
ईरान के साथ जंग के चलते, भारत-अमेरिका गठबंधन का पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी चरित्र और भारत, इस क्षेत्र और दुनिया के लोगों पर इसके पड़ने वाले दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं।
एलपीजी की कमी से करोड़ों शहरी परिवार प्रभावित हो रहे हैं, ख़ासकर फुटपाथ पर लगने वाले छोटे-छोटे खाने के स्टॉल और मोबाइल रेस्टोरेंट, जो सीमित व्यंजन बेचते हैं। इन 'व्यावसायिक प्रतिष्ठानों' के लिए एलपीजी सिलेंडर की क़ीमत में भारी उछाल आया है और यह पहले के 1,600-1700 रुपये प्रति सिलेंडर से बढ़कर लगभग 2,000-3,000 रुपये प्रति सिलेंडर हो गई है। इस अचानक झटके के कारण, इन छोटे कारोबारों को अपना कामकाज कम करने, पहले से ही सीमित मेनू को और छोटा करने या आपूर्ति की कमी के कारण पूरी तरह बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वहीं दूसरी ओर, पहले से ही ग़रीबी में जी रहे फ़ूड डिलीवरी कर्मचारियों की आय में दो-तिहाई की कमी आई है, क्योंकि रेस्टोरेंट को अपने खुलने के घंटे कम करने पड़े हैं।
शहरी क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश परिवार, जिनमें अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले मध्यम वर्ग और कम आय वाले मज़दूर वर्ग के परिवार दोनों शामिल हैं, रोज़मर्रा के खाना पकाने के लिए एलपीजी सिलेंडर का उपयोग करते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लगभग एक अरब लोगों में से अधिकांश अभी भी सूखे गोबर के उपलों और जलावन लकड़ी पर निर्भर हैं, जिन्हें महिलाएं और बच्चे बड़ी मेहनत से इकट्ठा करते हैं।
पूरे भारत में एलपीजी गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लग गई हैं। पहले कुछ दिनों में डिलीवरी हो जाती थी, लेकिन अब कई इलाक़ों में एक हफ़्ते से भी ज़्यादा की देरी हो रही है। लोग घबराकर ख़रीदारी कर रहे हैं, वहीं कालाबाज़ारी के नेटवर्क सिलेंडरों को बहुत ऊंची क़ीमतों पर बेच रहे हैं।
भारतीय मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि सरकार वैकल्पिक आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। खाड़ी मार्गों में व्यवधान की भरपाई के लिए अर्जेंटीना और अमेरिका जैसे देशों से आयात बढ़ाया जा रहा है। साथ ही, भारत अमेरिका द्वारा जारी अस्थायी प्रतिबंध छूट के तहत ईरानी आपूर्ति की पुनः खरीद पर भी विचार कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालात को कम करके दिखाने की कोशिश की है और जोर देकर कहा है कि आपूर्ति पर्याप्त है और अर्थव्यवस्था स्थिर है। हालांकि, ये आश्वासन ज़मीनी हक़ीक़त से बिल्कुल उलट हैं, जहां कमी, देरी और बढ़ती क़ीमतें पहले से ही आम हो गई हैं। सरकार के अपने कारनामों से भी ये आश्वासन झूठे साबित होते हैं।
28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के ठीक दस दिन बाद, मोदी सरकार ने आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (एस्मा) लागू कर दिया। एस्मा का प्रयोग आमतौर पर राष्ट्रीय और राज्य सरकारों द्वारा उन कर्मचारियों की हड़तालों को दबाने के लिए किया जाता है जो 'आवश्यक सेवाओं' के अंतर्गत आते हैं। इनमें स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता, जल आपूर्ति, रक्षा, संचार, परिवहन और सरकारी खाद्य वितरण शामिल हैं।
एस्मा के तहत, सरकार ने पेट्रोलियम रिफ़ाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया है, वितरण पर नियंत्रण लागू किया है और कमर्शियल कंज़्यूमर्स की तुलना में घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी है। कुछ क्षेत्रों में, सिलेंडर बुकिंग के बीच लंबे अंतराल जैसे प्रतिबंध लागू किए गए हैं, जिससे आपूर्ति प्रभावी रूप से सीमित हो गई है।
दूसरी तरफ़, रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि काला बाज़ार फल-फूल रहा है। जांच में अवैध रूप से ईंधन भरने वाले केंद्रों और मुनाफ़ाखोरी करने वाले गिरोहों का पर्दाफाश हुआ है जो कमी का फ़ायदा उठाकर सिलेंडरों को आधिकारिक दरों से कहीं अधिक क़ीमतों पर बेच रहे हैं। इस संकट का बोझ मुख्य रूप से ग़रीब कामकाजी परिवारों पर पड़ रहा है। ये परिवार, जो पहले से ही बढ़ती महंगाई से जूझ रहे हैं, खपत कम करने या घटिया ईंधन का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
यह कोई अपवाद नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का अपरिहार्य परिणाम है जिसमें आवश्यक वस्तुओं का वितरण, सामाजिक आवश्यकता के बजाय लाभ के लिए किया जाता है।
स्टालिनवादी संसदीय दलों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने ईरान पर साम्राज्यवादी युद्ध की निंदा की है। लेकिन उनका विरोध इस नज़रिये से है कि यह भारत के “राष्ट्रीय हित” के लिए हानिकारक है। यह उनकी उन्हीं कोशिशों से जुड़ा है जिसके तहत वे धुर दक्षिणपंथी मोदी सरकार के बढ़ते विरोध को कमज़ोर करना चाहते हैं, ताकि इसे कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की ओर मोड़ा जा सके, जो “निवेशक परस्त नीतियों” और भारत-अमेरिका गठबंधन के प्रति बीजेपी से कम प्रतिबद्ध नहीं है।
भारत के मज़दूर और मेहनतकशों को ईरान युद्ध, विश्व युद्ध के बढ़ते ख़तरे और प्रतिक्रियावादी भारत-अमेरिका रणनीतिक गठबंधन का विरोध करने के लिए एक वास्तविक समाजवादी अंतर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण से लैस होना चाहिए। युद्ध के विरुद्ध संघर्ष मज़दूर वर्ग में निहित होना चाहिए और इसका उद्देश्य भारत और विश्व स्तर पर एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में उसे संगठित करना होना चाहिए, ताकि सभी शोषितों को अपने साथ लाकर पूंजीवाद के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी विरोध खड़ा किया जा सके, जोकि युद्ध का मूल कारण है।
