यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी मूल लेख India’s ruling far-right BJP makes gains in state elections amid wave of anti-government working-class protests से किया गया है।
केंद्र शासित समेत भारत के पांच प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे चार मई को घोषित हुए, जो पूंजीवादी शासन के गहराते संकट और मज़दूर वर्ग को क्रांतिकारी सामाजवादी कार्यक्रम और रणनीति से लैस करने की तात्कालिकता की ओर संकेत करते हैं।
सामाजिक विरोध के बढ़ते दबाव और गहराते आर्थिक संकट के बावजूद भारत की सत्तारूढ़ हिंदू वर्चस्ववादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने, मुख्यधारा की राजनीति में एक दबदबे वाली पार्टी के रूप में खुद को और मजबूत किया है। पश्चिम बंगाल में उसने पहली बार जीत दर्ज की, जोकि भारत का चौथा सबसे घनी आबादी वाला प्रदेश है। और बीजेपी ने असम और पुडुचेरी में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ सत्ता बरकरार रखी।
तमिलनाडु में टीवीके (तमिलगा वेट्री कझगम- जिसका मतलब है- तमिलों की पार्टी की जीत) बहुमत से महज 10 सीटें पीछे रह गई। दो साल पहले फ़िल्म स्टार विजय ने इस पार्टी की स्थापना की थी। सन् 1967 से ही बारी बारी से राज्य की सत्ता में आने वाली डीएमके और एआईएडीएमके प्रतिद्वंद्वी तमिल क्षेत्रीय पार्टियों को इस पार्टी ने काफ़ी पीछे छोड़ दिया।
केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन ने चुनावों में ज़बरदरस्त जीत हासिल की है और स्टालिनवादी सीपीएम की अगुवाई वाले गठबंधन लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़) सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर दिया, जो बीते दो बार से चुनाव जीतती आ रही थी।
शासक वर्ग और भी अधिक दक्षिणपंथी रुझान की ओर झुका
कुल मिलाकर चुनावी नतीजों ने इस बात को रेखांकित किया कि पूंजीपति वर्ग, दक्षिण पंथ की ओर और खिसक रहा है। यह वर्ग, धुर दक्षिणपंथी बीजेपी को, भावी 'हिंदू नेता' नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, विश्व मंच पर अपनी महाशक्ति की विनाशकारी महत्वाकांक्षाओं को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने और देश में मज़दूरों के शोषण को तेज़ करने के सबसे अच्छे माध्यम के रूप में देखता है।
चुनावी चंदा इकट्ठा करने में बीजेपी लगातार अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को मिलाकर भी पीछे छोड़ना जारी रखे हुए है। इससे से भी अहम बात ये है कि कारपोरेट मीडिया और भारतीय सरकार के संस्थान, जनमें अदालतें और चुनाव आयोग भी शामिल हैं, खुले तौर पर सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी के साथ गलबहियां कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर वे मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के दमन और वोटरों के दमन के माध्यम से चुनावी धांधली में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत के साथ ही बीजेपी के समर्थन से भरे चुनाव आयोग ने निरंकुश तरीक़े से दसियों लाख वोटरों के नाम काट दिये, जिनमें मुख्य रूप से ग़रीब लोग हैं और बहुत अधिक मुस्लिम हैं। ये काम उसने अपने बहुत अधिक विवादित स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बहाने मतदाता सूचियों में हेर फेर करने के ज़रिये किया।
भारतीय और वैश्विक पूंजीपतियों की खुशी के लिए, मोदी सरकार ने हाल के महीनों में वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने वाले दो महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसने श्रम क़ानून में एक ऐसा 'सुधार' लागू किया है जो बड़े उद्यमों में सामूहिक छंटनी पर लगे प्रतिबंधों में ढील देता है, ठेका प्रथा के पहले से ही व्यापक इस्तेमाल की और खुली छूट देता है और मज़दूरों के हड़ताल करने के अधिकार को बहुत अधिक तक सीमित कर दिया है। ग्रामीण मज़दूरी को कम करने के बिल्कुल साफ़ इरादे से, मोदी की बीजेपी ने 'ग्रामीण रोज़गार गारंटी' (मनरेगा) योजना को ही समाप्त कर दिया है, जोकि पिछले दो दशकों से लाखों गरीब ग्रामीण परिवारों के लिए जीवन रेखा जैसा था।
दो साल पहले लोकसभा चुनावों के दौरान, भारतीय संसद के निचले और सबसे शक्ति शाली सदन यानी लोकसभा में बीजेपी को भारी झटका लगा था। साल 2014 में जब मोदी के नेतृत्व में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई, उसके बाद से पहली बार ऐसा हुआ कि उसने अपना बहुमत का आंकड़ा खो दिया। और इस घटना ने कोई भी क़ानून पास करने के लिए बीजेपी को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों पर निर्भर कर दिया।
हालांकि, तब से बीजेपी और उसके एनडीए सहयोगियों ने महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली और अब पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्यों सहित कई राज्य विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर ली है।
उम्मीद के मुताबिक़, बीजेपी और कॉर्पोरेट मीडिया अप्रैल-मई में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों का फ़ायदा उठाकर यह दावा कर रहे हैं कि मोदी को भारी समर्थन हासिल है और जनता बीजेपी के फासीवादी, हिंदू वर्चस्ववादी भारत के नज़रिये यानी हिंदुत्व को तेज़ी से अपना रही है। उनका मक़सद मज़दूर वर्ग को डराना और बीजेपी सरकार के विरोध को 'लोकतंत्र विरोधी' करार देना है, ताकि वे अपने आपराधिक कुकृत्यों और दमन को उचित ठहरा सकें।
सच्चाई ये है कि मोदी सरकार सामाजिक ज्वालामुखी के मुहाने पर पर बैठी है और वो इसके बारे में बखूबी जानती है। इसीलिए लगातार सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी, धार्मिक अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों को निशाना बनाने, पहले के मुकाबले और नंगे रूप में सेंसरशिप का इस्तेमाल करना और मज़दूर वर्ग की हड़तालों और प्रदर्शनों को कुचलना करना जारी रखा है।
जैसे-जैसे चुनाव प्रचार अभियान उरूज़ पर पहुंचा, ईरान पर अमेरिका-इसराइल के अवैध युद्ध के कारण वैश्विक ईंधन की क़ीमतों में आई भारी बढ़ोत्तरी से आजिज आकर मज़दूरों का व्यापक विरोध फूट पड़ा ख़ासकर, दिल्ली के आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में, जहां हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों की लहर चल पड़ी। दिल्ली भारत की राजधानी और सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। अप्रैल के मध्य में जब विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर था, दिल्ली के पास औद्योगिक उपनगर नोएडा में हज़ारों मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। इनमें से अधिकांश अस्थाई रूप से काम पर रखे गए ठेका मज़दूर थे। दिलचस्प है कि यह आंदोलन स्टालिनवादी और अन्य आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियनों के दायरे से बाहर उभरा था।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की बीजेपी सरकारों ने मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से निपटने के लिए हिंसा, बदनाम करने का अभियान और फर्ज़ी मुक़दमे थोपने का सहारा लिया। फ़र्ज़ी मुक़दमों में सैकड़ों वर्करों को जेल में डाल दिया गया है, जिनमें दर्जनों मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता भी शामिल हैं।
बीजेपी की 'ताक़त' पूरी तरह से कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के दक्षिणपंथी चरित्र और उन दलों और संगठनों द्वारा वर्ग संघर्ष के व्यवस्थित दमनल के रुख़ से पूरी तरह नत्थी है, जो कथित तौर पर इसके नाम पर बोलते हैं - विशेष रूप से, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीएम, अन्य स्टालिनवादी संसदीय पार्टियां और उनकी सहयोगी ट्रेड यूनियनें।
विपक्ष की हार में स्टालिनवादी सीपीएम की सबसे बड़ी हार
कांग्रेस पार्टी की साख़ पहले तो सरकारी नेतृत्व वाले राष्ट्रीय पूंजीवादी विकास के पतन की अगुवाई करने के बाद और फिर 1991 से 2014 तक, भारत को वैश्विक पूंजी के लिए सस्ते श्रम उत्पादन केंद्र में बदलने और अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ चीन विरोधी रणनीतिक गठजोड़ बनाने के पूंजीपति वर्ग के अभियान का नेतृत्व करने के बाद, व्यापक रूप से धूमिल हो गई है। इसका चुनावी ब्लॉक 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायंस (इंडिया)' बहुत जर्जर स्थिति में है जिसमें स्टालिनवादी पार्टियां भी शामिल हैं, हालांकि मुख्य तौर पर इसमें दो दर्जन से अधिक दक्षिणपंथी क्षेत्रीय, अस्मितावादी और जातिवादी पार्टियां हैं, जिनमें फासीवादी शिवसेना जैसी कई पार्टियां तो अतीत में बीजेपी के साथ गठबंधन भी कर चुकी हैं।
हालांकि दक्षिण भारत के केरल राज्य में कांग्रेस पार्टी सत्ता में लौटने में क़ामयाब हो गई, लेकिन इसकी ऑल इंडिया पहुंच और सीमित हुई है। तमिलनाडु में इसने महज पांच सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में सभी 294 विधानसभा सीटों पर लड़ने के बावजूद इसके खाते में महज दो सीटें ही आ सकीं और इसे इस राज्य में सिर्फ चार प्रतशत वोट मिले। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, भारत के 28 राज्यों में से सिर्फ चार राज्यों की सत्ता में है जबकि दो अन्य राज्यों में जूनियर पार्टनर के रूप में है। दूसरी तरफ़ बीजेपी अकेले दम पर 16 राज्यों में सत्ता में है, जबकि पांच राज्यों में गठबंधन सरकार चला रही है।
विधानसभा चुनावों के बाद, इंडिया गठबंधन के टूटने का ख़तरा मंडरा रहा है। इसके दो क्षेत्रीय स्तंभ, तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), सत्ता से बाहर हो गए। इसके अलावा, कांग्रेस ने, अपने डीएमके सहयोगी को अधर में छोड़कर राज्य की नई सरकार बनाने में टीवीके से हाथ मिला लिया है। तमिलनाडु में बुरी तरह हारे डीएमके मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कांग्रेस के इस फ़ैसले को 'पीठ में छुरा घोंपना', 'अवसरवादी' और 'विश्वासघात' बताया है।
विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी लूज़र रही, स्टालिनवादी सीपीएम और इसके लेफ़्ट फ़्रंट के सहयोगी।
दशकों से स्टालिनवादी, भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के एक अभिन्न अंग के रूप में कार्य करते रहे हैं - धुर दक्षिणपंथी बीजेपी का विरोध करने के नाम पर मज़दूर वर्ग को बड़े व्यवसाय परस्त कांग्रेस पार्टी का पिछलग्गू बनाते रहे हैं; जिन राज्यों में उन्होंने सरकार बनाई है, वहां मज़दूर विरोधी, बाज़ार परस्त नीतियां लागू करते रहे हैं; और जुझारू मज़दूर संघर्षों को अलग-थलग करते रहे हैं।
इसी भूमिका को निभाते हुए, स्टालिनवादियों ने अपने इंडिया गठबंधन के सहयोगियों को नाराज़ करने के डर से, ईरान पर अमेरिका-इसराइल के आपराधिक युद्ध के विरोध को अपने चुनाव प्रचार में मुद्दा नहीं बनाया। न ही उन्होंने ग़ज़ा जनसंहार, भारत-अमेरिका की 'वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' या इसराइल-भारत गठबंधन जैसे मुद्दों को उठाया, जिन्हें मोदी और नेतन्याहू ने ईरान युद्ध के ठीक पहले मजबूत करने की क़सम खाई थी। फिर भी, यह जंग भारत के मज़दूरों के लिए बढ़ती आर्थिक कठिनाई पैदा कर रहा है; वैश्विक स्तर पर भीषण युद्ध को जन्म देने का ख़तरा पैदा कर रहा है; और एक बार फिर यह दिखाता है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत का प्रतिक्रियावादी गठबंधन दक्षिण एशिया और दुनिया के लोगों के लिए किस प्रकार एक विनाशकारी हालात पैदा कर सकता है।
केरल में, सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ़ को 60 से अधिक सीटों का नुक़सान हुआ और उसने 2021 में 99 सीटों की तुलना में केवल 35 सीटें जीतीं। सत्ता में अपने एक दशक के दौरान, एलडीएफ़ ने निजी-सार्वजनिक भागीदारी, कॉर्पोरेट के लिए टैक्स रियायतें और विशेष आर्थिक क्षेत्रों सहित अधिक खुले तौर पर दक्षिणपंथी, निवेशक-परस्त नीतियों को अपनाया, जिससे उसे कॉरपोरेट जगत से खूब तारीफ़ मिली।
केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ़ सरकार की हार के साथ, 1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत में एक भी स्टालिनवादी नेतृत्व वाली राज्य सरकार नहीं है।
हालांकि, सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और बदतर परिणाम, पश्चिम बंगाल में सीपीएम और वाम मोर्चे के लिए रहा जहां उन्हें करारी हार मिली। प्रदेश में सीपीएम ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक शासन किया था।
टीएमसी की स्थापना करने वाली और पिछले सप्ताह तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी ने बीजेपी पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाया है। साल 2016 से पहले राज्य विधानसभा में बीजेपी के कभी भी एक से अधिक सदस्य नहीं चुने गए थे। यह निर्विवाद है कि बाीजेपी ने एक घिनौना और कुटिल चुनाव अभियान चलाया, जिसमें मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने को चुनौती देने वाले 23 लाख लोगों में से केवल कुछ ही लोगों को वोट डालने की अनुमति दी गई। लेकिन बनर्जी और उनकी टीएमसी के ख़िलाफ़ भी व्यापक जन विरोध था, जिसने एक भ्रष्ट, बड़े व्यवसायों की परस्त सरकार का नेतृत्व किया, जिसने अपने राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ नियमित रूप से हिंसा का इस्तेमाल किया।
फिर भी बनर्जी के समर्थन में विपक्ष को एकजुट करने में स्टालिनवादी पूरी तरह से असमर्थ साबित हुए, या यूं कहें कि उन लोगों का भी समर्थन हासिल करने में भी नाकाम रहे जो बीजेपी को पश्चिम बंगाल पर 'विजय प्राप्त करने' के अपने लंबे समय से घोषित लक्ष्य को साकार करने से रोकने की उम्मीद में टीएमसी से जुड़े हुए थे। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे 20वीं शताब्दी के पहले दशक में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ जन विरोध के उभार के बाद से 'वामपंथ' का गढ़ माना जाता रहा है।
यहां सीपीएम महज एक सीट जीत पाई और लेफ़्ट फ़्रंट के सहयोगी तो एक भी नहीं जीत सके। कुल मिलाकर, 2021 की तुलना में उनके वोटों में मामूली वृद्धि हुई।
पश्चिम बंगाल में सीपीएम/वाम मोर्चे के समर्थन में आई भारी गिरावट का विश्लेषण करना यहाँ उचित नहीं है। लेकिन दो बातें ज़रूर कही जानी चाहिए। 2011 में सत्ता से बेदख़ल होने से पहले के दशक में इसने खुद को पूंजीवादी शासन के स्तंभ के रूप में पेश किया। राष्ट्रीय स्तर पर, स्टालिनवादियों ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को एकजुट करने और उसे मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'मानवीय चेहरे वाले सुधार' के बहाने, यूपीए सरकार ने निवेशक-परस्त नीतियों को आगे बढ़ाया, जिनमें कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, निजीकरण, विनियमन में ढील और ठेका मज़दूरी वाले रोज़गार का विस्तार शामिल था, जिससे अमीरी ग़रीबी की खाई और बढ़ी। जब बुश प्रशासन इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में जंग लड़ रहा था, तब यूपीए सरकार ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ 'वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' के लिए हाथ मिलाया, जो भारत की विदेश नीति की आधारशिला बनी हुई है।
पश्चिम बंगाल में पहले की सीपीएम/वाम मोर्चा सरकार ने आईटी और आईटी-संबंधित उद्योगों में हड़तालों को ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया था, 'बीमार' सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को बंद कर दिया या बेच दिया था, बड़े व्यवसायों को टैक्स रियायतों और सब्सिडी के रूप में फ़ायदा पहुंचाया था और विशेष आर्थिक क्षेत्रों और अन्य बड़े व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए किसानों की ज़मीनों के अधिग्रहण के विरोध को दबाने के लिए पुलिसिया हिंसा और गुंडों का इस्तेमाल किया था।
नतीजतन एक कुख्यात कम्युनिस्ट विरोधी बड़बोली नेता और बीजेपी की पूर्व सहयोगी ममता बनर्जी, खुद को 'ग़रीबों का मसीहा' के रूप में पेश करने में सफल हो गईं।
पश्चिम बंगाल में सीपीएम कितनी भ्रष्ट और दक्षिणपंथी हो गई थी, इसका एक प्रमाण यह है कि पिछले दशक के मध्य से ही, इसके संरक्षण से पोषित पार्टी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, जिसमें गुंडों का एक नेटवर्क भी शामिल था, हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी में शामिल हो गया।
मज़दूर वर्ग को एक नया रास्ता अपनाना ही होगा
तमिलनाडु में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में कुछ और बातें कहना ठीक होगा। विजय एक विशिष्ट फ़िल्म स्टार और दक्षिणपंथी पूंजीवादी राजनेता हैं, जिनके उदाहरण दक्षिण भारत में कई हैं। उन्होंने और उनके साथ जुड़े डीएमके और एआईएडीएमके के पूर्व नेताओं के समूह ने व्यापक बेरोज़गारी और मामूली-रोज़गार, महंगाई, खस्ताहाल सार्वजनिक सेवाओं और पारंपरिक सत्ताधारी दलों में व्याप्त गहरे भ्रष्टाचार को लेकर बढ़ते जन आक्रोश का फायदा उठाया है।
रविवार को विजय ने, मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही घोषणा कर दी कि पिछली डीएमके सरकार राज्य के खजाने को खाली छोड़ गई है, जिस पर 10 लाख करोड़ रुपये (105 अरब डॉलर) का कुल कर्ज़ है। अपने कई लोकप्रिय चुनावी वादों से स्पष्ट रूप से पीछे हटते हुए, विजय ने घोषणा की कि उनकी टीवीके सरकार जल्द ही राज्य की वित्तीय स्थिति का विस्तृत ब्योरा देने वाला एक श्वेत पत्र जारी करेगी।
भारत के सबसे अधिक औद्योगिकृत राज्यों में से एक, तमिलनाडु हाल के सालों में कई उग्र श्रमिक वर्ग संघर्षों का केंद्र रहा है। हमेशा की तरह, सीपीएम के नेतृत्व वाले सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और सीपीआई से जुड़ी ऑल-इंडिया ट्रेड्स यूनियंस कांग्रेस (एटक) ने इन संघर्षों को कहीं पहुंचने नहीं दिया और मज़दूरों को डीएमके सरकार पर दबाव डालने की नीति सुझाई, ताकि वह उनकी ओर से हस्तक्षेप करे, जबकि सरकार ने मज़दूरों के ख़िलाफ़ पुलिसिया उत्पीड़न का इस्तेमाल किया। सीपीएम और सीपीआई एक दशक से अधिक समय से डीएमके के चुनावी सहयोगी रहे हैं और 'सामाजिक न्याय' के लिए लड़ने वाले संगठन होने के डीएमके के झूठे दावों की मिजाजपुर्सी करते रहे हैं। उन्होंने हाल ही में संपन्न हुए राज्य चुनाव में डीएमके के धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में जूनियनर सहयोगी के रूप में कांग्रेस पार्टी के साथ चुनाव लड़ा।
अब कांग्रेस के अपने सहयोगियों की तरह, सीपीएम और सीपीआई ने भी डीएमके का साथ छोड़ दिया है और टीवीके की नई सरकार को समर्थन देने का वादा किया है। उन्होंने दावा किया कि अगर ऐसा नहीं होता तो बीजेपी से जुड़ी एआईएडीएमके, संभावित रूप से राज्य में अल्पमत सरकार बना लेती।
स्टालिनवादियों ने स्पष्ट रूप से मज़दूर वर्ग को एक अंधी गली में धकेल दिया है। तीन दशकों में, 'बीजेपी से लड़ाई' के नाम पर, उन्होंने वर्ग संघर्ष को कुचल दिया है और मज़दूर वर्ग को कांग्रेस और अन्य बड़े व्यापारिक दलों से बांधकर रखा है। इसके परिणामस्वरूप, हिंदू वर्चस्ववादी धुर दक्षिणपंथी पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गए हैं।
मज़दूर वर्ग को स्थायी क्रांति की रणनीति पर आधारित एक नया रास्ता प्रशस्त करना होगा। लियोन ट्रॉट्स्की द्वारा सर्वप्रथम प्रतिपादित इस रणनीति ने अक्टूबर 1917 की रूसी क्रांति और उसके स्टालिनवादी पतन के विरुद्ध संघर्ष को प्रेरित किया।
भारतीय मज़दूर वर्ग को भारतीय पूंजीवाद और उसके सभी राजनीतिक प्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ संघर्ष में खेतिहर मज़दूरों को अपने साथ एकजुट करना होगा। विश्व समाजवादी क्रांति के विकास के एक हिस्से के रूप में, केवल एक मज़दूर सरकार की स्थापना के माध्यम से ही भारत के मज़दूरों और उनकी मूलभूत सामाजिक और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को साकार किया जा सकता है और किया जाएगा।
