यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी मूल लेख Modi demands India’s workers and toilers make “sacrifices” as economic fallout from Iran war expands से किया गया है।
भारत की घनघोर दक्षिणपंथी बीजेपी सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ा दी हैं। यह फ़ैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के कुछ ही दिनों बाद ही आया है। इस अपील में उन्होंने अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर ग़ैरक़ानूनी जंग के कारण बढ़ते आर्थिक दबाव की वजह से भारतीयों से ऊर्जा और फ़र्टिलाइज़र्स की खपत कम करने की अपील की थी।
11 मई को गुजरात के वडोदरा में बोलते हुए मोदी ने इस जंग के असर की तुलना कोविड-19 महामारी से की और लोगों से अपील की कि वे भारत के 1947 के बाद के युद्धकालीन समयों की तरह ही 'एकजुट' हों और 'त्याग' करें।
मोदी ने कहा, “जब भी भारत ने जंग या किसी बड़े संकट का सामना किया है, नागरिकों ने सरकार की अपील पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है। हमें अब भी वही करना होगा।”
उन्होंने आगे कहा, “हम सभी को एक साथ आने और देश के संसाधनों पर बोझ कम करने की अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की ज़रूरत है।” उन्होंने विशेष रूप से भारतीयों से आयात पर होने वाले ख़र्च को कम करने की अपील की ताकि विदेशी मुद्रा बचाई जा सके, क्योंकि इस समय “आयात की जाने वाली वस्तुओं की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ रही हैं और वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। जैसे हर बूंद से घड़ा भरता है, वैसे ही हर छोटा और बड़ा प्रयास मायने रखता है।”
मोदी के भाषण के पीछे दो मक़सद थे- पहला, ईरान पर युद्ध से पैदा हुए आर्थिक संकट का बोझ भारत के मज़दूरों और ग्रामीण मेहनतकशों पर डालने के लिए नई महंगाई और सार्वजनिक खर्च कटौती के उपायों की राजनीतिक ज़मीन तैयार करना। दूसरा, इस वर्गीय हमले के ख़िलाफ़ व्यापक जन विरोध को 'राष्ट्र-विरोधी' या यहां तक कि 'देशद्रोही' बताकर उसे अवैध ठहराने का बहाना मिल जाए।
मोदी ने लोगों से पेट्रोल डीज़ल का कम से कम इस्तेमाल करने, अधिक से अधिक सार्वजनिक यातायात साधनों का इस्तेमाल करने, कारपूलिंग बढ़ाने और 'अनावश्यक' यात्रा को कम करने की अपील की। ईंधन खपत करने और आने जाने की लागत करने के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को वर्क फ़्रॉम होम यानी घर से ही काम करने और ऑनलाइन मीटिंग करने और स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं चलाने पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
भारत अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत से ज़्यादा तेल आयात करता है। जंग से पहले इसका आधे से ज़्यादा हिस्सा सऊदी अरब और यूएई समेत अन्य खाड़ी देशों से आता था।
मोदी ने लोगों से खाने में इस्तेमाल होने वाले तेल और सोने की ख़रीद भी कम करने को कहा। भारत सूरजमुखी, सोयाबीन और पाम ऑयल समेत खाने के तेलों का दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में शामिल है, जबकि सोना देश का दूसरा सबसे बड़ा आयात है। इसका इस्तेमाल देश के आभूषण उद्योग में होता है, क्योंकि देश इसका बड़ा निर्यातक है, और आम भारतीय भी परंपरा के अनुसार इसे संपत्ति के रूप में संजो कर रखा जाता है।
सबसे अहम बात यह रही कि मोदी ने “आर्गेनिक खेती” को बढ़ावा देने के नाम पर किसानों से रासायनिक फ़र्टिलाइज़र्स का इस्तेमाल आधा करने और डीज़ल से चलने वाले सिंचाई पंपों की जगह सौर ऊर्जा वाले विकल्प अपनाने को कहा। 40 प्रतिशत से ज़्यादा लोगों की आजीविका की निर्भरता वाला भारतीय कृषि क्षेत्र, यूरिया और अमोनिया जैसे नाइट्रोजन खादों के लिए खाड़ी देशों से आयात पर बहुत निर्भर है।
यह सुझाव कि किसान तेज़ी से और बिना बड़े नुक़सान के आर्गेनिक खादों की ओर बढ़ सकते हैं, पूरी तरह अव्यावहारिक है। अगर बड़े पैमाने पर सरकारी वित्तीय और तकनीकी सहायता न मिले तो इसका नतीजा उत्पादन में तेज़ गिरावट होगा, जिससे किसानों की आमदनी घटेगी और खाने पीने के सामानों की क़ीमतें बढ़ेंगी।
पहले से ही जंग के कारण फ़र्टिलाइज़र्स की कमी और क़ीमतों में बढ़ोतरी किसानों, ख़ासकर कम आय वाले और साहूकारों के क़र्ज़ में दबे किसानों को नाइट्रोजन वाले खादों का इस्तेमाल कम करने पर मजबूर करेगी। इसका सामाजिक असर बेहद विस्फोटक हो सकता है। और यह ऐसे देश में हो रहा है जहां पहले ही करोड़ों लोग खाद्य असुरक्षा और भुखमरी का सामना कर रहे हैं।
अब जबकि जंग तीसरे महीने में पहुंच गई है, फ़र्टिलाइज़र्स की कमी साफ़ दिखाई देने लगी है। जंग शुरू होने से पहले ही 2025 की संसदीय रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर ग़ैरक़ानूनी काले बाज़ार, जमाखोरी और बेतहाशा दाम वसूली के मामले दर्ज किए गए थे।
बीजेपी सरकार ने अब तक सब्सिडी वाले फ़र्टिलाइज़र्स की क़ीमतें बढ़ाने से परहेज़ किया है। लेकिन फ़र्टिलाइज़र्स के इस्तेमाल में भारी कटौती की मोदी की अपील साफ़ तौर पर आने वाले हफ़्तों और महीनों में दाम बढ़ाने की तैयारी है।
मोदी ने भारत के मज़दूरों और मेहनतकशों से जिस 'त्याग' की मांग की है, उन्हें 'छोटे प्रयास' बताना उनकी सरकार की आम लोगों की परेशानियों के प्रति असंवेदनशीलता को ही दिखाता है। अपने 'त्याग' वाले संदेश को जनसमर्थन वाला रूप देने की कमज़ोर कोशिश में प्रधानमंत्री ने संपन्न लोगों से विदेशी छुट्टियां और हवाई यात्रा कम करने की अपील की।
असलियत यह है कि उनकी सरकार बड़े कारोबारियों के हितों की रक्षा के लिए बिछी हुई है। जैसा कि मेहनतकश लोगों से खपत कम करने की उसकी अपील से पूरी तरह साफ़ है कि सरकार बढ़ते वित्तीय और विदेशी मुद्रा संकट से निपटने में, कॉरपोरेट मुनाफ़े या अमीरों की आय और संपत्ति पर कोई बोझ डालने के पूरी तरह ख़िलाफ़ है।
इसके बजाय, जैसे-जैसे जंग का समय बढ़ेगा, संकट और गहराएगा, बीजेपी सरकार पूरा बोझ कामकाजी लोगों पर डालने के लिए और आक्रामक क़दम उठाएगी।
वडोदरा भाषण के चार दिन बाद और इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे कॉर्पोरेट मीडिया संस्थानों में बड़े बड़े लेख छपे कि दुनिया भर में बढ़ती ऊर्जा क़ीमतों से जनता को बचाना बंद करे, सरकार ने पहला क़दम उठाया। पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत में तीन-तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। यह चार साल से ज़्यादा समय में पहली बढ़ोतरी थी। साथ ही सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) की क़ीमत में दो रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी का आदेश दिया गया, जिसका भारत में यातायात ईंधन के रूप में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
यह बढ़ोतरी लगभग तयशुदा तौर पर सिर्फ़ शुरुआती क़िस्त है। विश्लेषकों ने तुरंत कहा कि यह वैश्विक बाज़ार में तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की भरपाई के लिए काफ़ी नहीं है। इससे पहले तेल उद्योग के नुक़सान को सीमित करने के लिए बीजेपी सरकार ने ईंधन पर एक्साइज़ ड्यूटी यानी उत्पाद शुल्क घटाया था, और ईंधन क़ीमतें स्थिर रखी थीं। लेकिन इससे नुक़सान का एक हिस्सा सरकारी तेल रिफ़ाइनरियों और ईंधन विक्रेताओं की बैलेंस शीट से हटकर सरकार पर आ गया।
जहां तक घर से काम करने के मोदी के सुझाव की बात है, निर्माण मज़दूरों, फ़ैक्ट्री मज़दूरों, रेहड़ी-पटरी वालों, सेल्स कर्मचारियों और स्वास्थ्यकर्मियों समेत ज़्यादातर लोगों के लिए यह संभव ही नहीं है। उन्हें इन और भविष्य में होने वाली ईंधन क़ीमत बढ़ोतरी का बोझ झेलना ही होगा। पूरे भारत में फ़ूड डिलीवरी कर्मचारियों को पहले ही बड़े पैमाने पर नौकरी गंवानी पड़ी है या उनकी आमदनी दो-तिहाई तक घट गई है क्योंकि जंग से जुड़ी एलपीजी कमी के कारण रेस्तरां और खाने के ठेले अपना समय घटाने या बंद करने पर मजबूर हुए हैं।
मोदी का वडोदरा भाषण में भुगतान संतुलन संकट की आशंका झलकती है और यह दिखाता है कि अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर हमले के कारण भारत में संकट कितना गहरा हो चुका है। इस जंग में हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी सरकार और भारतीय शासक वर्ग की सीधी मिलीभगत है।
नई दिल्ली ने साम्राज्यवादी हमले के ख़िलाफ़ आत्मरक्षा कर रहे ईरान की बार-बार आलोचना की है, जबकि अमेरिका और इज़राइल के युद्ध अपराधों पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। इसमें बातचीत जारी रहने के बावजूद बिना उकसावे के जंग शुरू करना, राजनीतिक नेतृत्व और वैज्ञानिकों पर 'सफ़ाया करने वाले' हमले और ट्रंप की ईरानी सभ्यता ख़त्म करने की जनसंहारक धमकियां शामिल हैं।
जिस तरह यह जंग भारत की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर रहा है, उसके बावजूद नई दिल्ली ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिससे वॉशिंगटन के साथ उसकी चीन-विरोधी वैश्विक रणनीतिक साझेदारी या इज़राइल से संबंधों पर कोई असर पड़े। दिलचस्प है कि मोदी जंग शुरू होने से ठीक पहले इज़राइल की यात्रा पर गए थे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने भाषण में मोदी ने ईरान का नाम तक नहीं लिया और ईरान पर जंग को 'पश्चिम एशिया का युद्ध' कहा, ताकि असली पीड़ित और भारत के हमलावरों से संबंधों की पर्देदारी की जा सके।
भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। जंग शुरू होने के समय 28 फ़रवरी को एक अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले 91 रुपये का स्तर, जो पहले ही रिकॉर्ड निचला स्तर था, अब भारतीय रिज़र्व बैंक के हस्तक्षेप के बावजूद 96.5 रुपये तक पहुंच गया है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि रुपया जल्द ही 100 रुपये प्रति डॉलर के पार जा सकता है। इस गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश (एफ़पीआई) में लगभग 23 अरब डॉलर की निकासी है, क्योंकि वैश्विक पूंजी को भारत की अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर भरोसा कम हो रहा है। ऊर्जा क़ीमतों और फ़र्टिलाइज़र्स संकट ने भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है।
जापानी वित्तीय सेवा कंपनी नोमुरा के अर्थशास्त्रियों ने टिप्पणी की है, “मोदी की टिप्पणियां संकेत देती हैं कि सरकार की वित्तीय हालत पर दबाव अंतिम बिंदु पर पहुंच रहा है, रुपये की और गिरावट सहना मुश्किल हो रहा है और इसका बोझ धीरे-धीरे उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता है।”
विपक्षी नेताओं ने अप्रैल-मई में हुए विधानसभा चुनावों से पहले और बाद में भारतीय अर्थव्यवस्था पर मोदी के बयानों में फ़र्क की ओर ध्यान दिलाया है।
मौजूदा संकट की तुलना कोविड महामारी से करते हुए और यह दावा करते हुए कि “जिस तरह हमने मिलकर महामारी पर क़ाबू पाया, उसी तरह इस संकट पर भी क़ाबू पाएंगे,” भारत के संभावित हिंदू सूरमा नेता शायद अपनी मंशा से ज़्यादा बोल गए। महामारी के दौरान सरकार की विनाशकारी नीतियों और “लोगों ज़िंदगी से पहले मुनाफ़ा” की नीति ने भारत को महामारी का वैश्विक केंद्र बना दिया था और 50 लाख से ज़्यादा मौतों का कारण बनी थी।
बीजेपी सरकार अच्छी तरह जानती है कि वह सामाजिक विस्फोट की स्थिति पर खड़ी है। बढ़ते सामाजिक असंतोष के जवाब में उसका रास्ता सरकारी दमन और सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी है। 'राष्ट्रीय एकता' और युद्धकालीन 'त्याग' को लेकर मोदी की बयानबाज़ी, मज़दूर वर्ग के विरोध को 'अपराध' घोषित करने के लिए बहाना तैयार करने की कोशिश है।
दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की राज्य सरकारों के ज़रिए मोदी सरकार ने दिल्ली के आसपास के औद्योगिक इलाक़ों में भड़की हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर दमन अभियान चलाया है। जैसा कि वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट पहले भी रिपोर्ट कर चुकी है, एक हज़ार से ज़्यादा मज़दूरों को गिरफ़्तार किया गया है और विरोध में शामिल होने पर उन पर हिंसा के मनगढ़ंत आरोप लगाए गए हैं। कई मज़दूर एक्टिविस्टों को भी निशाना बनाया गया और पुलिस ने उन्हें 'नक्सली' और पाकिस्तान का एजेंट बताकर बदनाम किया।
