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'कोई वर्कर फिर से उठ खड़ा न हो, राज्य इसकी नज़ीर बनाना चाहता है'- नोएडा में मजदूरों का बचाव करने वाले शख़्स से बातचीत

यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख “The state has to make a precedent that no worker will rise”: Interview with a defender of victimized workers in Noida, India का है जो 20 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ था।

वेतन बढ़ाने और सम्मान के साथ जीने की मांग को लेकर दिल्ली के आसपास के औद्योगिक इलाकों में रहने वाले दसियों हजारों मज़दूरों के हड़ताल को चार महीने से ज़्यादा समय बीत चुके हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उत्तर प्रदेश सरकार इन मज़दूरों और उनके समर्थन में खड़े हुए लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई जारी रखे हुए है। आदित्यनाथ एक हिंदू-फासीवादी नेता हैं और हिंदू वर्चस्ववादी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी सहयोगी हैं।

मज़दूरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन मज़दूर बिगुल से जुड़े आठ कार्यकर्ता अब भी जेल में हैं। उनके ख़िलाफ़ पांच पुलिस थानों में 11 अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज हैं। इनमें से दो कार्यकर्ताओं, आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा, पर औपनिवेशिक दौर के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की गई है। इस क़ानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना आरोप या मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।

नोएडा के मज़दूरों के समर्थकों पर लगाए गए कठोर एनएसए और अन्य आपराधिक आरोपों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन। [फ़ोटो: मज़दूर बिगुल] [Photo: Mazdoor Bigul (Workers’ Bugle)]

डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने दिल्ली के बवाना औद्योगिक इलाके में रहने वाले छात्र और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता केशव से बात की। केशव, आदित्य आनंद के भाई हैं। पुलिस ने आदित्य को 13 अप्रैल को हुई हिंसा का झूठा 'मुख्य साज़िशकर्ता' बताया है। केशव जेल में बंद मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की क़ानूनी लड़ाई में क़रीब से जुड़े रहे हैं। लंबाई की वजह से और स्पष्टता के लिए इंटरव्यू को संपादित किया गया है।

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सतीश साइमन: क्या आप घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा बता सकते हैं कि विरोध प्रदर्शन कैसे शुरू हुआ और उसके बाद गिरफ़्तारियां कैसे हुईं?

केशव: हरियाणा के मानेसर में रिचा ग्लोबल के मज़दूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर जीत हासिल की थी, इसके तुरंत बाद 9 अप्रैल को विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। इसी कंपनी की नोएडा ब्रांच के मज़दूरों ने भी वेतन बढ़ाने की मांग शुरू कर दी, क्योंकि एलपीजी की क़ीमत बढ़ने से उनके लिए अपना खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। मज़दूर बिगुल के कार्यकर्ता 10 अप्रैल को इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।

11 अप्रैल को पुलिस ने चार कार्यकर्ताओं, रूपेश, आकृति, सृष्टि और मनीषा को एक मेट्रो स्टेशन से गिरफ़्तार कर लिया। उस समय कोई हिंसा नहीं हुई थी। तीन महिलाओं पर धारा 151 के तहत मामला दर्ज किया गया। यह प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी एहतियाती हिरासत से जुड़ी धारा है। लेकिन एक एग्ज़ीक्युटिव मजिस्ट्रेट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जो गैरक़ानूनी है। धारा 151 के तहत कुल 14 दिन की ही हिरासत की अनुमति है और एग्ज़ीक्युटिव मजिस्ट्रेट के पास ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है। वकीलों को यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है। रूपेश पर आधार कार्ड में जालसाजी का अलग मामला दर्ज किया गया। पुलिस को उसे हिरासत में रखने के लिए बस कोई आरोप चाहिए था।

13 अप्रैल को पुलिस ने मज़दूरों पर सीधे हमला किया, जिसके बाद विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। करीब 2,500 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। इनमें 2,000 पुरुष और 500 महिलाएं थीं, जिनमें नाबालिग भी शामिल थे। उन्हें चार से पांच दिन तक प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा गया और किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। यह 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की तय सीमा का साफ़ उल्लंघन था। 19 अप्रैल तक 300 से ज्यादा मज़दूर जेल में थे और उनके ख़िलाफ़ 11 एफ़आईआर में मुकदमें दर्ज किए गए थे।

भारत का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (फ़ोटो: Planemad/Soumya-8974 / CC BY-SA 3.0) [Photo by Planemad/Soumya-8974 / CC BY-SA 3.0]

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समय जेल में बंद कोई भी कार्यकर्ता 13 अप्रैल को विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर मौजूद नहीं था। इनमें से चार पहले से ही हिरासत में थे। इसके बावजूद उन पर हत्या की कोशिश और ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों को गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं। आरोपपत्र में खुद माना गया है कि वे वहां मौजूद नहीं थे।

सतीश: एनएसए के तहत हिरासत को सही ठहराने के लिए राज्य सरकार मुख्य रूप से कौन से आरोप लगा रही है?

केशव: चार मुख्य आरोप हैं और सभी बेबुनियाद हैं।

पहला, राज्य सरकार का दावा है कि 22 मार्च को एक साज़िश रचने के लिए बैठक हुई थी। इसका आधार फ़ोन की लोकेशन का डेटा है, जिससे पता चलता है कि कई कार्यकर्ता एक जगह पर थे। असल में उस दिन बच्चों के लिए एक खुली लाइब्रेरी का उद्घाटन हुआ था। इसमें 1,000 से ज़्यादा लोग शामिल हुए थे। हमारे पास इसकी तस्वीरें हैं।

दूसरा आरोप है कि सत्यम वर्मा को 20 साल में विदेशी स्रोतों से 2 करोड़ रुपये (208,825.60 डॉलर) मिले। इससे यह संकेत देने की कोशिश की गई है कि उन्हें देश विरोधी गतिविधियों के लिए विदेशी फ़ंड मिला। सत्यम ProZ.com पर अकाउंट रखने वाले अनुवादक हैं। हमारे पास अलग-अलग विदेशी कंपनियों के इनवॉइस हैं, जिन्होंने PayPal के जरिए उन्हें डॉलर और यूरो में भुगतान किया था। यह आम तरीक़ा है। 20 साल में 2 करोड़ रुपये का मतलब हर महीने करीब 80,000 रुपये (835.30 अमेरिकी डॉलर) होता है, जो एक सामान्य मध्यम वर्गीय आय है। राज्य सरकार ने ऐसा एक भी रुपया नहीं दिखाया है जिसका इस्तेमाल किसी को उकसाने के लिए किया गया हो।

तीसरा, वे बिगुल मीडिया ग्रुप नाम के एक टेलीग्राम ग्रुप का हवाला देते हैं। इस ग्रुप का इस्तेमाल मज़दूर बिगुल के वीडियो और लेख साझा करने के लिए किया जाता था। आरोप पत्र में दिए गए स्क्रीनशॉट में ऐसे संदेश हैं, जैसे 'इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर पोस्ट करो' और 'इस लेख को ठीक करो।' इन लेखों में सरकार के क़ानूनों की आलोचना की गई थी, जो कोई गैरक़ानूनी काम नहीं है।

चौथा, रिचा ग्लोबल नोएडा नाम का एक व्हाट्सऐप ग्रुप है। राज्य सरकार का दावा है कि आरोपियों ने इस ग्रुप का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया। असल में, संदेशों से पता चलता है कि आदित्य और दूसरे लोग बार-बार मज़दूरों से शांतिपूर्ण रहने की अपील कर रहे थे। जब हमने इस ग्रुप की जांच की तो पता चला कि हिंसा भड़काने वाले संदेश पुलिसकर्मी ही पोस्ट कर रहे थे। हमने उन नंबरों पर फ़ोन किया और उनकी रिकॉर्डिंग की। इनमें से एक सब-इंस्पेक्टर था और दूसरा दिल्ली के गृह मंत्रालय में काम करने वाला ड्राइवर था। ड्राइवर को एक एफ़आईआर में गिरफ़्तार किया गया और 15 दिन में ज़मानत मिल गई। सब-इंस्पेक्टर के ख़िलाफ़ कुछ नहीं हुआ।

इसके अलावा, आरोपपत्र में दर्ज प्रत्यक्षदर्शियों के बयान एक-दूसरे की हूबहू नकल हैं। 169 एफ़आईआर में से मैंने 37 की जांच की। इनमें करीब 15 में बयान शुरुआत से अंत तक 95 से 100 प्रतिशत तक एक जैसे थे।

सतीश: गिरफ़्तार किए गए कार्यकर्ताओं को पुलिस हिरासत में किन हालात से गुजरना पड़ा?

केशव: आदित्य को 17 अप्रैल को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली से गिरफ़्तार किया गया था। स्थानीय मजिस्ट्रेट ने शुरुआत में ट्रांजिट रिमांड देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उत्तर प्रदेश पुलिस की अर्जी सही प्रारूप में नहीं थी। लेकिन शाम तक पुलिस ने किसी तरह वह अर्जी हासिल कर ली और आदित्य को विमान से उत्तर प्रदेश ले आई। वहां पहुंचते ही एक पुलिस थाने में 15 से 20 पुलिसकर्मियों ने उन्हें तीन घंटे तक पीटा।

29 और 30 अप्रैल को पुलिस हिरासत के दौरान आदित्य को रात करीब 1 बजे एक अज्ञात जगह, कुछ झाड़ियों के पास ले जाया गया। पुलिस वहां पहले ही केरोसिन की बोतलें और मशाल की लकड़ियां रख चुकी थी। उन्होंने आदित्य से इन्हें उठाने को कहा और इसका वीडियो बनाया, ताकि झूठा सबूत तैयार किया जा सके। जब उन्होंने इनकार किया तो पुलिस ने उन्हें पीटा। 30 अप्रैल को जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उन्होंने बताया कि उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया है। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने डीसीपी से जांच का आदेश दिया।

गिरफ़्तार मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की चार महीने की गैरक़ानूनी हिरासत के विरोध में 10 अगस्त को हैदराबाद में प्रदर्शन। [फ़ोटो: मज़दूर बिगुल] [Photo: Mazdoor Bigul (Workers’ Bugle)]

हिरासत में प्रताड़ना को लेकर हमने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की। 15 मई को जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ने माना कि 'वे आतंकवादी नहीं हैं' और आदेश दिया कि आगे पुलिस पूछताछ जेल के अंदर ही होनी चाहिए। अगली सुनवाई 7 अगस्त को है। इसमें हम प्रताड़ना और झूठे सबूत तैयार करने की सीबीआई जांच की मांग करेंगे।

सतीश: राज्य सरकार ने इस ख़ास विरोध प्रदर्शन के ख़िलाफ़ इतनी सख़्ती से कार्रवाई क्यों की?

केशव: नोएडा एक बड़ा औद्योगिक केंद्र है। जब मज़दूर वेतन बढ़ाने की मांग लेकर सड़कों पर उतरे तो राज्य सरकार को उद्योगपतियों को जवाब देना था। मोदी सरकार ने 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस' के नारे के तहत चार लेबर कोड्स (श्रम संहिताएं) लागू किए हैं। यह मज़दूरों का और ज़्यादा शोषण करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाला मुलम्मा है। योगी सरकार एक नज़ीर क़ायम करना चाहती है कि अगर मज़दूर अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाएंगे तो उनके साथ यही होगा। इसी वजह से एनएसए लगाया गया और 11 एफ़आईआर दर्ज की गईं।

योगी सरकार के लिए नोएडा को निवेशकों के सामने रिपोर्ट कार्ड के तौर पर पेश करने की सबसे अहम जगह है। लेकिन पूरा सरकारी तंत्र दिखाता है कि फासीवादी शासक मज़दूरों के साथ कैसे व्यवहार करते हैं। पिछले दो साल से सरकार हर छह छह महीने में बहुत ही कमज़ोर तर्क पर असेंशियल सर्विसेज़ मेंटेनेंस एक्ट (आवश्यक सेवा अनुरक्षण क़ानून) लागू कर रही है, ताकि सरकार से जुड़े विभागों में काम करने वाले कर्मचारी विरोध प्रदर्शन या यूनियन बनाने की कोशिश न कर सकें। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खुद एक दूसरे मामले में टिप्पणी की थी, जोकि इस मामले में भी बेहद प्रासंगिक है, कि उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारी क़ानून या संविधान के मुताबिक़ काम नहीं करते, बल्कि अपने राजनीतिक सरगनाओं को खुश करने के लिए काम करते हैं। वे अपने वरिष्ठों को ख़ुश करने के लिए नियमित रूप से एफ़आईआर दर्ज करते हैं या उन्हें दबाते हैं और प्रिवेंटिव डिटेंशन के क़ानूनों का इस्तेमाल करते हैं।

सतीश: ट्रेड यूनियनों की क्या भूमिका रही?

केशव: केंद्रीय ट्रेड यूनियन, यानी संशोधनवादी संगठन, पूरी तरह ग़ायब रहे। उनका कहीं कोई पता नहीं था। सिर्फ हम वहां थे।

सतीश: 2012 के मारुति सुज़ुकी मामले ने इस तरह के झूठे मामले में फंसाने के लिए एक मिसाल कायम की थी। क्या आपको दोनों मामलों में समानता दिखाई देती है?

केशव: मैं उस मामले को मोटे तौर पर जानता हूं। उस मामले में भी मज़दूरों के प्रति सहानुभूति रखने वाले एचआर मैनेजर की बाउंसरों ने हत्या कर दी थी और इसका आरोप मज़दूरों पर मढ़ दिया गया था। 13 मज़दूरों को उम्रकैद की सजा मिली थी। उस समय एक मज़दूर ने कहा था कि 'यह वर्ग संघर्ष था और ऐसा ही था।'

अब भी वही तरीक़ा अपनाया जा रहा है। पहले उकसाना, फिर बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां और उसके बाद झूठे आरोप। पुलिस हमारे व्हाट्सऐप ग्रुप में घुस गई और खुद हिंसा के लिए उकसाने वाले संदेश पोस्ट किए। मज़दूरों का एकमात्र 'अपराध' यह था कि वे ऐसी सैलरी की मांग कर रहे थे जिससे वे अपना निर्वाह आसानी से कर सकें।

सतीश: मज़दूरों और जेल में बंद कार्यकर्ताओं की मौजूदा स्थिति क्या है?

केशव: करीब 50 मज़दूर अब भी जेल में हैं, हालांकि ज़्यादातर को अब हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट से ज़मानत मिल गई है। मज़दूरों पर अधिकतम चार एफ़आईआर में मामले दर्ज किए गए थे। इसलिए उनकी क़ानूनी लड़ाई कुछ कम जटिल रही है, हालांकि 11,000 रुपये महीने कमाने वाले लोगों के लिए यह अब भी बेहद मुश्किल है।

आठ कार्यकर्ताओं के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट से लेकर सेशन कोर्ट तक के वकीलों से संपर्क किया है। शुरुआत में उन पर तीन एफ़आईआर में मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन जैसे ही हमने ज़मानत की अर्जियां लगानी शुरू कीं, पुलिस नई नई एफ़आईआर में उनके नाम जोड़ती गई। जून तक करीब हर 10 दिन में एक नई एफ़आईआर जोड़ी गई। आख़िरी एफ़आईआर 172 थी, जो एक जुलाई को दर्ज की गई। अब हम हर एफ़आईआर में ज़मानत के लिए आवेदन कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक उन्हें रिहा करा लिया जाएगा। लेकिन हमें नहीं पता कि आगे और एफ़आईआर जोड़ी जाएंगी या नहीं।

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डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस नोएडा के मज़दूरों के संघर्ष और उनके समर्थन में खड़े लोगों के ख़िलाफ़ जारी क़ानूनी कार्रवाई पर नज़र रखेगा। नोएडा के विरोध प्रदर्शन को अपराध बताना पूरे मज़दूर वर्ग पर हमला है। मोदी सरकार चाहती है कि सबसे ज़्यादा शोषित मज़दूर बिना किसी शिकायत के कठोर परिस्थितियों में काम करते रहें।

जैसा कि मारुति सुज़ुकी के मामले में मज़दूरों को झूठे मुकदमे में फंसाने की बात सामने आई, भारत का शासक वर्ग, चाहे वह बीजेपी के तहत हो या कांग्रेस पार्टी के तहत, भारत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सस्ते मज़दूरों की जगह बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसका जवाब स्वतंत्र रैंक एंड फ़ाइल कमेटियां बनाना है, जो पूंजी परस्त ट्रेड यूनियन के अधिकारियों के ख़िलाफ़ विद्रोह करें और दुनिया भर के मज़दूर वर्ग की एकजुटता के लिए लड़ें।

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