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'हमें वास्तव में वर्गीय एकता की ज़रूरत है': ट्रक ड्राइवर गुरविंदर सिंह को चाकू मारे जाने पर बोले सिख वकील

यह अनुवाद अंग्रेज़ी “We truly do need class solidarity”: Sikh attorney speaks on stabbing of truck driver Gurvinder Singh” के मूल का है जो 24 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुआ था।

13 सितंबर को 28 साल के सिख ट्रक ड्राइवर गुरविंदर सिंह पर वायोमिंग में इंटरस्टेट 80 हाईवे के किनारे बने एक दूर-दराज़ के बिटर क्रीक रेस्ट स्टॉप के टॉयलेट में बेरहमी से हमला किया गया और उन पर चाकू से 17 वार किए गए। कैलिफ़ोर्निया के सैक्रामेंटो में रहने वाले सिंह पेनसिल्वेनिया जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने तड़के साढ़े तीन बजे के आस पास चेहरा धोने और आराम करने के लिए गाड़ी रोकी थी।

चाकू से हमले के बाद अस्पताल में ठीक हो रहे ट्रक ड्राइवर और कैलिफ़ोर्निया के सैक्रामेंटो निवासी गुरविंदर सिंह. (फ़ोटो: लवप्रीत सिंह) [Photo: Lovepreet Singh]

गुरविंदर सिंह को अब अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी है। उनके शरीर पर अब भी टांके लगे हैं और उन्हें पूरी तरह ठीक होने में लंबा वक़्त लगेगा। इसके लिए उन्हें लगातार इलाज और आगे की मेडिकल देखभाल की ज़रूरत होगी। उनके पास मेडिकल इंश्योरेंस नहीं है। उनके परिवार ने इलाज, दोबारा स्वस्थ होने की प्रक्रिया, काम से हुई आमदनी के नुक़सान और दूसरी ज़रूरी ज़रूरतों का ख़र्च उठाने के लिए GoFundMe पर एक कैंपेन शुरू किया है।

वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट ने 23 सितंबर को कैलिफ़ोर्निया के वकील और जकारा मूवमेंट में लीगल प्रोग्राम्स के डायरेक्टर जसजीत सिंह से बात की। जकारा कैलिफ़ोर्निया का एक संगठन है, जो पंजाबी सिख युवाओं, परिवारों और समुदायों के साथ काम करता है। हमले के बाद जसजीत, गुरविंदर से मिलने और उन्हें क़ानूनी मदद देने के साथ-साथ समुदाय की मदद का भरोसा दिलाने के लिए कैस्पर स्थित वायोमिंग मेडिकल सेंटर गए थे।

होमलैंड सिक्योरिटी विभाग की सोशल मीडिया पोस्ट, जिसे बाद में हटा दिया गया. इसमें सिख ट्रक ड्राइवरों को निशाना बनाते हुए लिखा गया था, “हमारी सड़कों से हट जाओ. तुम्हें गाड़ी चलाना नहीं आता, मिस्टर सिंह”, 9 सितंबर 2026. (फ़ोटो: होमलैंड सिक्योरिटी विभाग) [Photo: Department of Homeland Security]

लंबाई और स्पष्टता के लिए इस इंटरव्यू को संपादित किया गया है।

जैकब क्रॉस: आप वायोमिंग मेडिकल सेंटर में गुरविंदर सिंह से मिलने गए थे। जब आपने उन्हें देखा, तब उनकी शारीरिक हालत कैसी थी और उन्हें ठीक होने के लिए किन चीज़ों से गुज़रना पड़ सकता है?

जसजीत सिंह: उन पर चाकू से 17 वार किए गए थे, लेकिन इसके बावजूद वे मुझसे बातचीत कर पा रहे थे और मुझे बता रहे थे कि उनकी हालत कैसी है। मैंने उनसे कई बार पूछा, “आप कैसे हैं?” और ज़ाहिर है, उनका जवाब था, “आप जानते हैं, मैं किसी तरह संभल रहा हूं। मैं ठीक हूं।” और मुझे लगता है कि इसका कुछ मतलब है, है न? मुझे लगता है कि वह मज़बूत बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि हममें से कोई भी शायद यह नहीं समझ सकता कि इस तरह के दर्द से गुज़रना कैसा होता है?

जेसी: हमले के अलावा, गुरविंदर के बारे में एक इंसान, एक वर्कर और सिख समुदाय के सदस्य के तौर पर और क्या पता है?

जेएस: वह पिछले साढ़े तीन साल से, या करें लगभग चार साल से ट्रक चला रहे हैं। वह इस रास्ते को भली भांति जानते हैं। मेरा ख़याल है कि पिछले लगभग दो साल से वह कैलिफ़ोर्निया से पेनसिल्वेनिया, शिकागो और उत्तर-पूर्वी इलाक़े तक हाईवे 80 के इसी रास्ते पर आते-जाते रहे हैं। इसलिए यह उनके लिए एक जाना पहचाना रास्ता रहा है।

उनके अपने शब्दों में कहें, तो उनके ऊपर ट्रैफ़िक नियम तोड़ने का कोई मामला दर्ज नहीं है। उन्हें कभी तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चलाने का चालान नहीं मिला और न ही पार्किंग का कोई चालान हुआ है। वह ऐसे ड्राइवर हैं, जिनसे आप सड़क पर भी ख़ुशी ख़ुशी मिलना चाहेंगे। वह अपनी सुरक्षा को बहुत गंभीरता से लेते हैं। दूसरों की सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं। यही वजह है कि जो हुआ, उस पर उन्हें यक़ीन नहीं हो पा रहा है।

यह कहते हुए मुझे अच्छा नहीं लग रहा, लेकिन आप जानते हैं कि लोग क्या कहते हैं- जब तक आप नियमों का पालन करते हैं और सही काम करते हैं, तब तक आपके साथ सब ठीक रहेगा, है न? लेकिन यहां एक ऐसा शख़्स है, जो नियमों का पालन करता है, हर काम सही तरीक़े से करता है, आराम करने के लिए एक रेस्ट एरिया में रुकता है और उस पर चाकू से 17 बार वार किए जाते हैं।

जेसी: हमले से चार दिन पहले, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने एक तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें 'मिस्टर सिंह' को सड़क से हट जाने के लिए कहा गया था। आपने पहले चेतावनी दी थी कि कोई इस तरह की बयानबाज़ी को ख़ुद क़ानून हाथ में लेने की खुली छूट समझ सकता है। क्या आप ट्रंप प्रशासन के बनाए उस माहौल के बारे में बता सकते हैं, जिसमें अप्रवासियों और सिखों के ख़िलाफ़ नफ़रत बढ़ रही है?

जेएस: बिल्कुल। आप जानते हैं, सिंह उपनाम है, सरनेम है या मिडिल नेम। दुनिया में हर सिख पुरुष यह नाम इस्तेमाल करता है। इसलिए मुझे लगता है कि ट्रंप प्रशासन, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (डीएचएस) या जिस किसी ने भी वह पोस्टर जारी करने का शानदार विचार दिया था, उसने ऐसा जान-बूझकर किया।

मैं यह दावा नहीं कर रहा कि इस व्यक्ति ने जो किया, उसकी वजह उस पोस्टर से जुड़ी थी। अभी तक हमें इस घटना के पीछे की वजह का पता नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि यह घटना किसी ख़ाली माहौल में नहीं हुई। हमारे लोग सड़कों पर हैं। वे हर वक़्त चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि ऐसी बयानबाज़ी हो रही है जिसमें सड़क पर होने वाली हर गंभीर दुर्घटना के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जाता है।

इसका निशाना किसी एक ख़ास समुदाय को बनाया जा रहा है। और यह वही समुदाय है, जो यहां आधी सदी या उससे भी ज़्यादा समय से ट्रक चला रहा है और ट्रकिंग उद्योग में अहम भूमिका निभाता है।

मैंने ऐसी रिपोर्टें देखी हैं, जिनमें कहा गया है कि अमेरिका में रहने वाले सभी सिखों में से लगभग 20 फ़ीसदी ट्रकिंग उद्योग से जुड़े हैं। किसी ख़ास समुदाय को बदनाम करना और जान-बूझकर 'मिस्टर सिंह' कहना। मुझे पता है कि होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने यह कहने की कोशिश की कि वो फ़्लोरिडा की एक ख़ास घटना के बारे में कह रहे थे? लेकिन मैं इस दलील को चुनौती देता हूं। अगर आप किसी एक ख़ास घटना की बात करना चाहते हैं, तो आप उस व्यक्ति का पहला नाम इस्तेमाल करेंगे। आपको अच्छी तरह पता है कि आप क्या कर रहे हैं।

हम इसे पूरी तरह साबित नहीं कर सकते, लेकिन उनके हाथ सचमुच ख़ून से रंगे हैं। मेरी राय में, वे लोगों को ख़तरे में डाल रहे हैं, चाहे ऐसा जान-बूझकर कर रहे हों या अनजाने में।

जेसी: 2012 में नियो-नाज़ी और अमेरिकी सेना के पूर्व सैनिक वेड माइकल पेज ने ओक क्रीक में विस्कॉन्सिन के सिख मंदिर पर हमला किया था। इस हमले में छह श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी और सातवें व्यक्ति को जानलेवा चोटें आई थीं। क्या अमेरिकी सिख उस माहौल और आज के माहौल के बीच कोई संबंध देखते हैं, जिसमें संघीय सरकार पगड़ी पहनने वाले लोगों या सिंह नाम रखने वालों को विदेशी ख़तरे के तौर पर पेश करती है?

जेएस: सिख समुदाय इस घटना का संबंध इस बात से जोड़ रहा है कि यह सब 9/11 की बरसी के आसपास हुआ। 9/11 को 25 साल हो चुके हैं। पोस्टर 9 सितंबर को आया, 9/11 की बरसी ज़ाहिर है 11 सितंबर को थी और फिर 13 सितंबर को मिस्टर सिंह पर हमला हुआ। इसके बाद 15 सितंबर 2001 को बलबीर सिंह सोढ़ी की बरसी आती है। वह अमेरिका में 9/11 के बाद नफ़रत के चलते किए गए अपराधों में जान गंवाने वाले पहले व्यक्ति थे।

बलबीर सिंह सोढ़ी (फ़ोटो: बलबीर सिंह सोढ़ी का परिवार) [Photo: Family of Balbir Singh Sodhi]

इसलिए समुदाय इसी बारे में सोच रहा है। यानी 25 साल बाद भी बयानबाज़ी, तस्वीरें और शब्द एक जैसे हैं। हम जानते हैं और अपने अनुभव से जानते हैं कि शब्द मायने रखते हैं। बयान मायने रखते हैं। तस्वीरें मायने रखती हैं। हम पहले भी इसका ख़ामियाज़ा भुगत चुके हैं और अब भी भुगत रहे हैं।

किसी और ने मुझसे पूछा, “चीज़ें कैसे बदली हैं?” मैंने कहा, कई मायनों में चीज़ें नहीं बदली हैं। कुछ मामलों में हमने बस ज़्यादा सतर्क रहना सीख लिया है। लेकिन आख़िर हम कब तक और कितने सतर्क रह सकते हैं? और किस मोड़ पर समुदाय यह कहेगा कि क्या हम कभी इतना कर पाएंगे कि... और मुझे नहीं पता कि हम ऐसा करने की कोशिश कर भी रहे हैं या नहीं... सबके बीच घुल-मिल सकें? मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं सबके बीच घुलने-मिलने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन क्या हम कभी इतना कर पाएंगे कि कम से कम अपनी सुरक्षा बनाए रख सकें और यह कह सकें कि हम भी यहां के हैं?

सवाल अब भी है कि “क्या हम पर्याप्त अमेरिकी हैं?” या “क्या हमें पर्याप्त सम्मान मिल सकता है और क्या लोग हमें ठीक से समझ सकते हैं?” क्योंकि लोगों को जागरूक करने के लिए चलाए जाने वाले जनहित संदेश हर बार काम करते हुए नहीं दिखते। हो सकता है कि लोग जानते हों कि हम कौन हैं, लेकिन क्या वे सचमुच हमें समझते हैं?

मेरा मतलब है, अगर आप फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम पर कमेंट देखते हैं, तो हो सकता है कि उनमें बॉट्स भी हों। मैं यह समझता हूं। लेकिन अगर आप कमेंट सेक्शन को ग़ौर से देखें, तो वहां असली लोग लिख रहे हैं, “अफ़सोस, उस आदमी ने अपना काम पूरा नहीं किया।” या “यह ज़रूर इसलिए हुआ होगा क्योंकि वह ऐसा या वैसा कर रहा था। पंजाबी ट्रक ड्राइवर ने शायद गाड़ी ग़लत जगह खड़ी की होगी या सड़क के नियमों का पालन नहीं किया होगा।”

मेरा मतलब है, लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं... सबसे पहली बात, इनमें से कुछ भी सच नहीं है। यह एक ऐसा हमला था, जिसे बिना किसी उकसावे के अंजाम दिया गया। मैं यह बात अपनी जानकारी के आधार पर कह सकता हूं। इस हमले को सही ठहराने की कोशिश करना ही उस डर की वजह है, जो मुझे इस बात से लगता है कि अमेरिकी समाज, या कम से कम यहां के समाज का एक छोटा-सा हिस्सा, किस तरह सोचता है। ऐसा लगता है कि कई मामलों में लोगों को हिंसा को सही ठहराने का कोई न कोई तरीक़ा मिल जाता है। क्या इस समय हिंसा को सही ठहराना हमारी सोच में इस क़दर बस गया है कि हम अमेरिकी होने के नाते इसके लिए वजहें तलाशने लगे हैं?

जेसी: यह हिंसा निश्चित रूप से शासक वर्ग की सोच में गहराई तक बैठी हुई है। इसका मुक़ाबला करना और यह समझना वर्करों की ज़िम्मेदारी है कि अमेरिकी सिखों पर हमले, लैटिनो लोगों पर हमले और अप्रवासियों पर हमले दरअसल हर किसी पर हमला हैं। ये सभी के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले हैं।

अगर सरकार मिस्टर सिंह को बदनाम कर सकती है और उनके ख़िलाफ़ नस्लवादी तस्वीरों का इस्तेमाल कर सकती है, तो मिस्टर जॉनसन को निशाना बनाने में भी उसे ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा। प्रशासन ने 10 करोड़ लोगों को देश से निकालने की बात की है। जबकि यहां 10 करोड़ ग़ैर-क़ानूनी अप्रवासी हैं ही नहीं। यह हमला पूरे मज़दूर वर्ग पर बढ़ते हमलों का हिस्सा है।

प्रशासन जब अप्रवासी ट्रक ड्राइवरों के ख़िलाफ़ अपना अभियान तेज़ कर रहा है, तो क्या सिख और पंजाबी ड्राइवरों ने रेस्ट स्टॉप, सामान चढ़ाने-उतारने की जगहों या वज़न जांचने वाले केंद्रों पर आम लोगों, पुलिस या अप्रवासन अधिकारियों की तरफ़ से बढ़ते उत्पीड़न की शिकायत की है?

जेएस: मैं कहूंगा कि इसके आंकड़े मौजूद हैं। मेरा मानना है कि कुछ समय पहले एक लेख आया था, जिसमें कहा गया था कि 2025 में एशियाई अमेरिकियों के ख़िलाफ़ आईसीई की गिरफ़्तारियों की संख्या 1,000 फ़ीसदी बढ़ गई। और मेरा ख़याल है कि यह आंकड़ा सिर्फ़ कैलिफ़ोर्निया का था।

मुझे लगता है कि एक और बात यह है कि कई बार समुदाय सोचते हैं, “यह हमारे समुदाय के साथ नहीं हो रहा है। किसी दूसरे समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।” लेकिन यह घटना याद दिलाती है कि हर किसी को निशाना बनाया जा रहा है। हम सभी निशाने पर हैं। किसी भी वजह से, मुझे यह कहना होगा कि हम इस देश में कुछ लोगों के तय किए हुए ढांचे में फिट नहीं बैठते। इसलिए हां, हमारे लोग यह सब महसूस कर रहे हैं। हमारे लोग बहुत सतर्क हैं।

जेसी: इस महीने की शुरुआत में, मेक्सिको से सीमा पार करके आने-जाने वाले सैकड़ों ट्रक ड्राइवरों ने मेक्सिको और कैलिफ़ोर्निया के बीच व्यावसायिक सीमा चौकियों को बंद कर दिया था। इसकी वजह अमेरिका की तरफ़ से उनके बी-1 वीज़ा रद्द करना था। क्या इस कार्रवाई पर सिख या पंजाबी ड्राइवरों का ध्यान गया? इससे भी बड़े सवाल पर बात करें, तो अलग-अलग अप्रवासी समुदायों पर हो रहे इन हमलों के ख़िलाफ़ वर्कर एकजुट होकर कैसे लड़ सकते हैं?

जेएस: मैंने इस बारे में कुछ नहीं सुना है। लेकिन मुझे लगता है कि यहां मेक्सिकन अमेरिकी, आम तौर पर लैटिनो लोग, हमारे अश्वेत अप्रवासी, जैसे हैती का समुदाय और दूसरे लोग जो महसूस कर रहे हैं, वे सभी बातें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। मुझे लगता है कि हमें यही काम करना है।

मेरा मतलब है, आपके साथ इस इंटरव्यू के बारे में सोचते हुए मेरे मन में यही सवाल आता है कि हम लोगों तक यह बात कैसे पहुंचाएं कि मज़दूर वर्ग पर सामूहिक हमला हो रहा है? यानी मज़दूर वर्ग के नज़रिये से देखें। ये सभी मज़दूर हैं।

मज़दूरों के अधिकार सिर्फ़ किसी एक मुद्दे या किसी एक जगह तक सीमित नहीं हैं। इनका दायरा बढ़ना चाहिए। हमें इस सोच को भी अपनाना होगा कि अगर कहीं 400 ट्रक ड्राइवर परेशानियों का सामना कर रहे हैं, तो कल हमारी बारी भी हो सकती है। मुझे लगता है कि हमें हमेशा इस बात पर लौटना चाहिए। ऐसा हमारे साथ भी हो सकता है। इस बात को हर समुदाय के सदस्य की सोच में गहराई से बैठना चाहिए।

जेसी: बहुत से पाठक सिख धर्म के बारे में ज़्यादा नहीं जानते होंगे। इसके बुनियादी सिद्धांत क्या हैं और अमेरिका में सिख पहचान को लेकर आपको आम तौर पर किन ग़लतफ़हमियों का सामना करना पड़ता है?

जेएस: सिख धर्म की शुरुआत दक्षिण एशिया के पंजाब क्षेत्र में हुई थी। पंज का मतलब पांच और आब का मतलब पानी है। पांच नदियों की ज़मीन भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्से में स्थित है। ब्रिटिश शासन के बाद आज का पंजाब भारत के पंजाब राज्य और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बंटा हुआ है। सिख साम्राज्य की राजधानी कभी लाहौर हुआ करती थी, जो अब पाकिस्तान में है। दुनिया की ज़्यादातर सिख आबादी आज भारत के पंजाब राज्य में रहती है।

पहले सिख गुरु, गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी। इसके मूल में तीन सार्वभौमिक सिद्धांत हैं- नाम जपना यानी एक निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर को याद करना। किरत करो यानी ईमानदारी से रोज़ी कमाना। वंड छको यानी जो कुछ आपके पास है, उसे दूसरों के साथ बांटना।

सिखों के पूजा स्थल को गुरुद्वारा कहा जाता है। इसका मतलब है गुरु का द्वार। दुनिया भर के बड़े गुरुद्वारों में लगभग 24 घंटे किसी भी व्यक्ति को मुफ़्त भोजन दिया जाता है। इसमें जाति, नस्ल, धर्म, लिंग या सेक्सुअल ओरिएंटेशन के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने ख़ालसा की स्थापना की थी। ख़ालसा उन सिखों का समूह है, जिन्होंने दीक्षा ली है और जो विशेष कोड ऑफ़ कंडक्ट के मुताबिक़ जीवन बिताते हैं। सभी सिखों को ख़ालसा बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। ख़ालसा सिख पांच ककार या आस्था के पांच प्रतीक धारण करते हैं। किसी सिख से मिलने पर आम तौर पर इन्हीं प्रतीकों को आसानी से पहचाना जा सकता है। ये हैं- केश यानी बिना कटे बाल, कड़ा यानी लोहे का कंगन, कंघा यानी छोटी कंघी, कच्छेरा यानी लंबा अंदरूनी वस्त्र और कृपाण यानी तलवार या कटार।

इन पहचाने जाने वाले प्रतीकों की वजह से ज़रूरत के वक़्त सिखों को आसानी से पहचाना जा सकता है और लोग उनसे मदद मांग सकते हैं। लेकिन इसी वजह से उन्हें नफ़रत, कट्टरता और नस्लवाद का निशाना भी बनाया गया है।

किसी ऊंचे मक़सद के बारे में सोचना, दूसरों की मदद करना और ईमानदारी से रोज़ी कमाना, ये सभी सार्वभौमिक सिद्धांत हैं। आइए, दूसरों से छीनने की कोशिश न करें। मुझे लगता है कि आज दुनिया को इसकी बहुत ज़रूरत है, ख़ासकर ऐसे वक़्त में, जब हमारे पास खरबपति हैं, आप जानते हैं, अरबों-खरबों से भी आगे की दौलत वाले लोग हैं, या उन्हें जो भी नाम देना चाहें।

जेसी: आप चाहते हैं कि सिख समुदाय से बाहर के ट्रक ड्राइवर और दूसरे वर्कर इस हमले के बारे में क्या समझें और इसके जवाब में क्या करें?

जेएस: देखिए, मुझे लगता है कि यही वह वक़्त है। इतिहास में ट्रक ड्राइवरों ने हमेशा एक-दूसरे का ख़याल रखा है? मुझे लगता है कि हम उस दौर से दूर जा रहे हैं, जब ट्रक ड्राइवर सीबी रेडियो पर एक-दूसरे से बात करते थे और कहते थे, “अरे, आगे क्या हो रहा है, यह देख लेना। वहां पुलिस वाला है।” पहले यह आम बात थी। ट्रक ड्राइवर एक-दूसरे का ख़याल रखते थे। दूसरे ट्रक ड्राइवरों के आसपास आप ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस कर सकते थे। इस काम में एक तरह का भाईचारा होता है।

हमें उसी भावना की तरफ़ लौटना होगा। यह बात कि हमला करने वाला भी एक ट्रक ड्राइवर था और उसने बिना किसी उकसावे के हमला किया, एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि हमें किस तरह की एकजुटता बनानी होगी।

मैं बहुत-सी नकारात्मक टिप्पणियां देख रहा हूं। और ये सिर्फ़ उन लोगों की तरफ़ से नहीं हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रवाद की तरफ़ झुकाव रखते हैं। वे सोचते हैं, “मैं ट्रंप जैसे लोगों या ताक़तवर वर्ग के लोगों की नज़र में आना चाहता हूं।” मुझे नहीं पता कि मुझे कितनी बार अपनी पूरी ताक़त से चिल्लाकर यह कहना पड़ेगा- आपको कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।

और मुझे लगता है कि हमारे लोगों को, हर किसी को यह समझना होगा कि हमें सचमुच वर्गीय एकजुटता की ज़रूरत है। लोगों को समझना होगा कि हमें एक-दूसरे के लिए खड़ा होना होगा। वरना हम सभी को इसके नतीजे भुगतने पड़ेंगे। हैरानी की बात यह है कि हम पहले से ही इसके नतीजे भुगत रहे हैं।

डीज़ल 9 डॉलर प्रति गैलन है। एक बड़े ट्रक की टंकी भरने में 1,800 से 2,000 डॉलर तक ख़र्च होते हैं। यह पागलपन है! और इसके बावजूद लोगों को अब भी प्रति मील सिर्फ़ 2 या 3 डॉलर मिल रहे हैं। मैं यह इसलिए जानता हूं, क्योंकि मेरे पिता भी ट्रक ड्राइवर हैं। उन्होंने अमेरिका में 44 साल तक ट्रक चलाया। ट्रक चलाने की दरों में वास्तव में कोई ख़ास सुधार नहीं हुआ है।

अब सोचिए, अगर आप पेनसिल्वेनिया तक ट्रक चला रहे हैं, जो 2,500 मील दूर है, और आपको हर मील के लगभग 3 डॉलर मिलते हैं, तो आपकी कमाई 7,500 डॉलर होगी। और मुझे नहीं पता, वहां तक पहुंचने में शायद लगभग इतनी ही रक़म डीज़ल पर ख़र्च हो जाती है। लोगों को इससे कमाई नहीं हो रही है।

इसके बजाय हम क्या कर रहे हैं? हम दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों और दूसरे समूहों को दोष दे रहे हैं। हम कहते हैं, “तुम मेरी नौकरी छीन रहे हो।” क्या हम सचमुच लोगों की नौकरियां छीन रहे हैं, जबकि ये नौकरियां पहले से यहां मौजूद हैं और ट्रक ड्राइवरों की कमी भी है? हम इस पेशे को छोड़ सकते हैं। अगर उद्योग से जुड़े 20 फ़ीसदी लोग कल काम छोड़ दें, तो सिर्फ़ इतना होगा कि चीज़ें महंगी हो जाएंगी, क्योंकि सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाला कोई नहीं होगा।

इसलिए लोगों को मिलकर काम करना होगा और यह समझना होगा कि डीज़ल की क़ीमतें कैसे कम की जाएं और ईरान में चल रहे इस अन्यायपूर्ण युद्ध को कैसे रोका जाए। तब हालात बेहतर होंगे। जब आपकी जेब में ज़्यादा पैसे होंगे और आप अपने परिवार का पेट भर सकेंगे, तो स्वाभाविक रूप से आप किसी से नाराज़ नहीं होना चाहेंगे।

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