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व्यापक दमन के बावजूद मतदाता सूची में मोदी सरकार की सफ़ाई के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी

यह हिन्दी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Protests against Modi government’s purge of voter rolls continue despite mass repression का है जो 18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुआ था।

मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने के ख़िलाफ़ भारत की राजधानी दिल्ली में दो अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस प्रदर्शनकारियों पर हमला करती हुई। (फ़ोटो: दीपक सिंह/फ़ेसबुक) [Photo: Deepak Singh/Facebook)]

मतदाता सूची से दसियों लाख ग्रामीण ग़रीब और मज़दूर वर्ग के वोटरों को निकालने के अपने कारनामे के ख़िलाफ़, युवाओं की अगुवाई वाले प्रदर्शनों की लहर को रोकने में, व्यापक सरकारी दमन के बावजूद, भारत की धुर दक्षिणपंथी बीजेपी सरकार नाकाम साबित हुई है।

पिछले शुक्रवार को हज़ारों लोगों ने प्रशासन की ओर से व्यापक पुलिसिया कार्रवाई को चुनौती देते हुए भारत की राजधानी नई दिल्ली के केंद्र में प्रदर्शन किया। यह हाल ही में बने जेन ज़ी यूथ प्रोटेस्ट आंदोलन, प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की अपील पर आयोजित किया गया था। सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर चलाए जा रहे अभियान के तहत राष्ट्रीय झंडा फहराने और “लहरा दो तिरंगा” का नारा देने की अपील की थी।

बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र और दिल्ली सरकारों ने जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के पास हज़ारों पुलिसकर्मियों को तैनात किया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के दसियों हज़ार जवानों को रिज़र्व में भी रखा गया था। प्रदर्शन के दौरान कम से कम 150 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। इससे पहले दिन में आंदोलन के दो प्रमुख नेताओं, सीजेपी फ़ाउंडर अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसाकी अध्यक्ष नेहा बोरा को 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' में ले लिया गया।

दीपके और बोरा को प्रभावी रूप से 'ग़ायब' कर दिया गया। 12 घंटे से भी ज़्यादा समय तक उन्हें अपने वकीलों, संगठनों या परिवारों से संपर्क नहीं करने दिया गया। पुलिस यह बताने से भी इनकार करती रही कि उन्हें कहां रखा गया है। आख़िरकार पता चला कि बोरा को सेंट्रल दिल्ली से लगभग 20 किलोमीटर दूर मंगोलपुरी स्थित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स के कार्यालय में अकेले हिरासत में रखा गया था।

बीजेपी सरकार ने तेज़ी से बढ़ रहे इस विरोध आंदोलन को अपराध घोषित करने के लिए असाधारण कदम उठाए हैं। सरकार ने राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए राज्य की ताक़त का इस्तेमाल उस स्तर पर किया है, जैसा 1974 में इंदिरा गांधी की सरकार के समय देखने को मिला था। उस समय इंदिरा गांधी ने देशव्यापी रेलवे हड़ताल को कुचलने के लिए सेना तैनात की थी और एक साल बाद देश में आपातकाल लगा दिया था।

मोदी और हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी को सबसे बड़ा डर यह है कि यह विरोध आंदोलन व्यापक मज़दूर वर्ग के ग़ुस्से को भड़का सकता है जो बड़े पैमाने पर फैली ग़रीबी, ब्रिटिश राज के दौर के बाद से सबसे अधिक बढ़ी सामाजिक असमानता, मज़दूरों के बढ़ते शोषण, तानाशाही और सांप्रदायिक रिएक्शन के ख़िलाफ़ फूट सकता है। अप्रैल में दिल्ली के बाहरी इलाक़ों में स्थित औद्योगिक क्षेत्रों मानेसर और नोएडा में दसियों हज़ार मज़दूरों ने कम मज़दूरी और लंबे कामकाजी घंटों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था। पुलिस उनके ख़िलाफ़ बहुत ही क्रूर तरीक़े से पेश आई थी।

पिछले शनिवार, 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी, माओवादी नेतृत्व वाले आइसा और स्टालिनवादी संसदीय दलों की ओर से बुलाए गए 'राष्ट्रीय' विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए सरकार ने सुरक्षा बलों के दसियों हज़ार जवान तैनात किए। मेट्रो नेटवर्क के बड़े हिस्से को बंद कर दिया गया, 45 ट्रेनें रद्द कर दी गईं, कार और बस से राजधानी क्षेत्र में प्रवेश करने वाले लोगों की जांच की गई और हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया।

जैसा कि वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट (डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस) पहले भी बता चुकी है, इन प्रदर्शनों की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में सामने आया कि चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत करोड़ों नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इनमें बड़ी संख्या में ग़रीब लोग, प्रवासी मज़दूर, दलित और मुसलमान शामिल हैं। लेख के मुताबिक, यह बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने का अभियान है, जिसका निशाना मुख्य रूप से आबादी के वे हिस्से हैं जो बीजेपी का विरोध करते हैं।

16 अक्टूबर को हुए 'लहरा दो तिरंगा' प्रदर्शन पर राज्य की दमनात्मक कार्रवाई और दीपके और बोरा को हिरासत में लिए जाने के बाद संसदीय विपक्ष के तमाम दलों ने इसकी आलोचना की। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “यह अघोषित आपातकाल से कम नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि ये कार्रवाई “एक ऐसे फ़ासीवादी शासन” की है जो ऐसी आवाज़ बर्दाश्त नहीं कर सकता जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सकता। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, डीएमके नेता एम.के. स्टालिन और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सभी ने दोनों नेताओं की तत्काल रिहाई और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की।

हालांकि, इन विपक्षी नेताओं का नाटकीय आक्रोश उनकी राजनीति के असली चरित्र को छिपा नहीं सकता। वे छात्रों और बेरोज़गार यूनिवर्सिटी ग्रैजुएट्स के बढ़ते विद्रोह को भारत की पूंजीवादी व्यवस्था की राजनीति और उसके संस्थानों के दायरे तक ही सीमित रखना चाहते हैं। ये नेता ख़ुद भी इसी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं।

नेहा बोरा को आख़िरकार शनिवार सुबह पुलिस ने रिहा कर दिया। दीपके पर अधिक गंभीर आरोप लगाए गए थे। उन्हें शनिवार दोपहर एक ग़ैर चुने हुए विशेष प्रशासनिक मजिस्ट्रेट ने सशर्त ज़मानत दी। रिहाई की शर्त के रूप में दीपके को हलफ़नामा देने पड़ा कि वह एक साल तक ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जिससे 'शांति भंग हो या क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो।' यह एक ऐसा प्रतिबंध है जिसका मक़सद सीजेपी फ़ाउंडर और उसके सबसे चर्चित प्रवक्ता की आवाज़ को दबाना है।

पिछले शनिवार के प्रदर्शन को भारत का तिरंगा फहराने के नाम पर आयोजित करना इस बात का संकेत है कि सीजेपी और स्टालिनवादी नेता आंदोलन को राष्ट्रवादी और सत्ता-समर्थक राजनीतिक दायरे में सीमित रखना चाहते हैं। 'लहरा दो तिरंगा' एक राष्ट्रवादी अपील है, जो वैचारिक आधार पर बीजेपी के हिंदू-राष्ट्रवादी झंडा लहराने के अभियान को चुनौती देने के बजाय उसी के लिए जगह छोड़ती है। लोकतांत्रिक अधिकारों पर खुले हमले कर रही सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन करने वाले नेता उसी राज्य के प्रतीकों में ख़ुद को लपेट रहे हैं जो दमन कर रहा है। अरविंद केजरीवाल का भड़काऊ जवाब, “अगर हम अपने ही देश में तिरंगा नहीं लहराएंगे, तो क्या पाकिस्तान में लहराएंगे?”, उस कथित 'धर्मनिरपेक्ष' विपक्ष की खोखली राजनीति को उजागर करता है जो राष्ट्रवाद और पाकिस्तान-विरोधी कट्टरता के मुद्दे पर बीजेपी से होड़ करता है।

सीजेपी, आइसा और विभिन्न 'वामपंथी' दलों के नेताओं के पूरे समर्थन से युवा आंदोलन की मांगों को बेहद सीमित रखा गया है। इन दलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), यानी सीपीएम, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और आइसा का मूल संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन शामिल हैं। आंदोलन की मुख्य मांगें सिर्फ़ एक अधिकारी, ज्ञानेश कुमार को हटाने और एसआईआर को रोकने तक सीमित हैं।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठनों में से कोई भी मोदी सरकार को सत्ता से हटाने की मांग नहीं कर रहा है। यह सरकार पुलिस दमन और तानाशाही तरीक़ों से शासन कर रही है। ये सभी संगठन मज़दूर वर्ग की ओर रुख़ करने, उसकी सामाजिक ताक़त को आम हड़ताल के ज़रिए संगठित करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई को मोदी सरकार के पीछे खड़े पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ संघर्ष से जोड़ने के विरोधी हैं।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग एक बंद गली है। वह मोदी सरकार के एक वफ़ादार सहयोगी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। बीजेपी सरकार ने 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम पारित कराया था। इसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से नाममात्र की स्वतंत्रता भी हटा दी गई और नियुक्ति का अधिकार प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता वाले पैनल को दे दिया गया। व्यावहारिक रूप से यह व्यवस्था मोदी सरकार को चुनाव आयोग में अपने चहेते लोगों को नियुक्त करने का रास्ता देती है।

इसके अलावा, 2023 के क़ानून की धारा 16, चुनाव आयुक्तों को व्यापक क़ानूनी छूट देती है। इसमें कहा गया है कि “कोई भी अदालत किसी मौजूदा या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन या कथित निर्वहन के दौरान किए गए किसी काम, कार्रवाई या बोले गए शब्दों को लेकर किसी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही पर विचार नहीं करेगी और न ही उसे जारी रखेगी।”

कांग्रेस पार्टी ने 10 अक्टूबर को सीजेपी और वामपंथी दलों की ओर से आयोजित प्रदर्शन से दूरी बनाए रखी। वह राज्य के अधिकारियों को चुनौती दे रहे युवा आंदोलन से ख़ुद को बहुत ज़्यादा जोड़ना नहीं चाहती थी। इसके बजाय कांग्रेस ने पिछले सोमवार को अपना अलग प्रदर्शन आयोजित किया। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला, जिसे बीजेपी सरकार ने होने दिया।

हालांकि, बीते सप्ताह दीपके, सीजेपी के अन्य नेताओं और स्टालिनवादी दलों के समर्थन से विरोध प्रदर्शनों को कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी चुनावी गठबंधन 'इंडिया' से और मज़बूती से जोड़ने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। इसमें माओवादी आइसा की नेहा बोरा प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।

पिछले सोमवार को कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन में बोरा को ख़ास अहमियत दी गई। कांग्रेस के खानदानी नेता राहुल गांधी उन्हें भीड़ के बीच से आगे ले गए और इंडिया गठबंधन की एक बैठक में उन्हें माइक दिया। वहां बोरा ने कहा, “हम एकजुट हैं।”

कांग्रेस नेता राहुल गांधी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च के दौरान आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा (आगे बाईं ओर) और अपनी बहन व कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी को साथ। (फ़ोटो: फ़ेसबुक पर वायरल वीडियो) [Photo: Facebook viral video]

इंडिया गठबंधन का मक़सद लोकतांत्रिक अधिकारों पर बीजेपी के हमले को हराना नहीं, बल्कि 2029 में होने वाले अगले चुनाव में मोदी की जगह एक दक्षिणपंथी पूंजीवादी सरकार लाना है। ऐसी सरकार बीजेपी की “निवेशक परस्त” नीतियों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत की सैन्य-रणनीतिक गठजोड़ को जारी रखेगी। स्टालिनवादी दल सीपीएम, सीपीआई और सीपाईआ-एमएल लिबरेशन, सभी इस गठबंधन में सक्रिय रूप से शामिल हैं।

मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए नीचे से उठने वाले आंदोलन के प्रति कांग्रेस की शत्रुता कर्नाटक में साफ़ दिखाई दी। वहां कांग्रेस की राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे पता चलता है कि विपक्ष भी अपने हितों के मुताबिक़, आंदोलन को दबाने के लिए उसी दमनकारी व्यवस्था का इस्तेमाल करने को बेताब है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक बार फिर ख़ुद को सरकार की तानाशाही का समर्थन करने वाली संस्था के रूप में दिखाया है। अदालत ने एसआईआर प्रक्रिया को मंज़ूरी दी थी। जब बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की बात से इनकार करना मुश्किल हो गया, तो उसने पुनरीक्षण के अंतिम चरण का काम न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया, लेकिन नाम हटाने की प्रक्रिया को जारी रहने दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जिन्होंने बेरोज़गार युवाओं को 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा था, ने साफ़ कर दिया है कि अदालत की चिंता लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर नहीं है। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि विरोध प्रदर्शनों से यात्रियों और कारोबारियों को 'अनुचित परेशानी' होती है।

दिल्ली के कारोबारी संगठनों की चिंता भी यही है। वे प्रदर्शन के कारण होने वाली रुकावटों के लिए आयोजकों से मुआवज़े की मांग कर रहे हैं।

भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन कोई अकेली घटना नहीं है। यह मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ दुनिया भर के पूंजीपति शासक वर्गों के बड़े पैमाने के हमले का हिस्सा है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन 2026 के मध्यावधि चुनावों में हेरफेर करने की कोशिश कर रहा है और भारत में वोटरों के नाम हटाने की प्रक्रिया और एसआईआर की खुले तौर पर तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मॉडल बता रहा है। फ़्रांस और पूरे यूरोप में सरकारें सार्वजनिक खर्च कटौती, युद्ध और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमलों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों और युवाओं पर पुलिस दमन कर रही हैं। ग़ज़ा में जारी जनसंहार और विश्व युद्ध की ओर बढ़ते क़दम पूंजीवादी शासन के इसी संकट के सबसे चरम उदाहरण हैं।

वोटिंग लिस्ट से नाम हटाने के अभियान के ख़िलाफ़ संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई को पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता। भारत में मज़दूर वर्ग का सिर्फ़ एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन ही, जो 'संयुक्त समाजवादी दक्षिण एशिया' के लिए संघर्ष में पूरे दक्षिण एशिया के अपने मज़दूर भाई-बहनों के साथ एकजुट हो और जो विश्व समाजवाद की दिशा में एक पहला कदम हो, ग़रीबी, युद्ध और तानाशाही से बाहर निकलने का रास्ता दिखा सकता है। असली दुश्मन कोई मंत्री, कोई चुनाव आयुक्त, या केवल मोदी और उनकी बीजेपी नहीं हैं। असली दुश्मन तो खुद यह वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था है।

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